राज्य सेवाओं में minor penalty (जैसे निन्दा/Censure) को अक्सर “हल्की सजा” मानकर प्रक्रिया को औपचारिकता समझ लिया जाता है। लेकिन State Public Services Tribunal, U.P., Lucknow (Court No. 07) ने Claim Petition No. 1131/2023 (Chandrahas Mishra बनाम State of U.P. & Others) में साफ कहा कि minor penalty में भी fair procedure, cogent evidence और speaking order अनिवार्य है—वरना दण्ड टिक नहीं सकता।

मामला: 15.03.2021 को कथित अवैध बालू से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली पकड़े जाने के प्रसंग में याची (पुलिस निरीक्षक) पर आरोप लगाए गए कि उसने स्पष्ट निर्देश नहीं दिए, दबाव में वाहन छोड़वाने जैसी भूमिका रही और FIR में देरी हुई। विभाग ने audio clips और CDR पर भरोसा करते हुए Censure order दिनांक 04.01.2023 पास किया; अपील 12.03.2023 और रिवीजन 02.05.2023 को खारिज कर दिया गया।

निर्णायक कानूनी बिंदु: पहले की preliminary enquiry report (31.03.2021) में याची दोषमुक्त था, लेकिन बाद में दूसरी preliminary enquiry (08.11.2022) के आधार पर सजा दी गई। ट्रिब्यूनल ने कहा—पहली रिपोर्ट को formally set aside/review/recall किए बिना और recorded reasons/fresh material के बिना दूसरी जाँच पर टिककर दण्ड देना मनमाना है; Rule 14 (1991 Rules) का ढांचा “successive enquiries” को यांत्रिक रूप से स्वीकार नहीं करता।

साथ ही, audio/CDR की selective interpretation बिना forensic authentication के कमजोर आधार है—“suspicion proof नहीं होता।” आदेशों में पर्याप्त कारण-विश्लेषण नहीं था और अपील/रिवीजन भी “mechanical affirmation” जैसे लगे।

नतीजा: ट्रिब्यूनल ने Censure (04.01.2023), Appeal (12.03.2023) और Revision (02.05.2023)—तीनों को quash कर दिया; censure entry हटेगी और सेवा रिकॉर्ड में भविष्य के लिए नहीं पढ़ी जाएगी। हालांकि monetary benefits/interest नहीं मिले क्योंकि वास्तविक आर्थिक नुकसान सिद्ध नहीं था।

Judgment/Order