WRIT – A No. – 2353 of 2026 at Allahabad : Surendra Dutt Kaushik Vs. State Of U.P. And 6 Others
Date of Judgment/Order 
– 24/2/2026
Court Number – 32
Judgment Type – Final AFR
Coram – Hon’ble Saurabh Shyam Shamshery,J.
Petitioner’s Counsels – Awadh Narain Rai
Respondent’s Counsel – Arjun Prasad Yadav , C.S.C. and Ritesh Upadhyay

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारित हालिया निर्णय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत को पुनः स्पष्ट किया गया है कि सेवानिवृत्ति के पश्चात किसी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध धनवसूली या पेंशन से कटौती केवल वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए ही की जा सकती है। वाद संख्या Writ–A No. 2353 of 2026 में न्यायालय ने यह विचार किया कि क्या मात्र एक तथ्यान्वेषी (fact finding) जांच रिपोर्ट के आधार पर सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य से लगभग 11 लाख रुपये की वसूली की जा सकती है।

प्रकरण की पृष्ठभूमि यह थी कि याची पूर्व में भी न्यायालय आया था और दिनांक 15.12.2023 के आदेश द्वारा न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि पूर्व में की गई जांच विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही नहीं थी, बल्कि अधिकतम एक तथ्य संकलन प्रक्रिया थी। न्यायालय ने यह भी कहा था कि यदि राज्य को वसूली करनी है तो उसे विधि के अनुसार कार्यवाही करनी होगी, विशेष रूप से सिविल सेवा विनियमों के अनुच्छेद 351-A के अधीन।

अनुच्छेद 351-A के अनुसार राज्यपाल को यह अधिकार सुरक्षित है कि यदि किसी पेंशनर को विभागीय या न्यायिक कार्यवाही में गंभीर दुराचार अथवा शासन को आर्थिक क्षति पहुँचाने का दोषी पाया जाए तो उसकी पेंशन रोकी या उससे वसूली की जा सकती है। किन्तु यह शक्ति स्वतःस्फूर्त नहीं है; इसके लिए स्पष्ट अनुमति, विधिवत आरोपपत्र, तथा पूर्ण अनुशासनिक जांच आवश्यक है।

वर्तमान प्रकरण में सेवानिवृत्ति की तिथि पर न तो कोई विभागीय कार्यवाही लंबित थी और न ही अनुच्छेद 351-A के अंतर्गत राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर विधिवत आरोपपत्र जारी किया गया। बाद में शासन स्तर से एक पत्र दिनांक 07.11.2025 के माध्यम से वसूली का निर्णय संप्रेषित किया गया, परंतु न्यायालय ने पाया कि उस पत्र की भाषा से यह परिलक्षित नहीं होता कि यह राज्यपाल की विधिवत स्वीकृति थी। केवल शासन का प्रशासनिक निर्णय अनुच्छेद 351-A की संवैधानिक आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर सकता।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि पूर्व की तथ्यान्वेषी जांच को आधार बनाकर सीधे वसूली का आदेश पारित करना विधि-सम्मत नहीं है। यदि राज्य को गंभीर आरोपों — जैसे कि मध्यान्ह भोजन योजना में गबन — की जांच करनी थी, तो उसे आरोपपत्र जारी कर पूर्ण विभागीय कार्यवाही करनी चाहिए थी। बिना आरोपपत्र और बिना साक्ष्य परीक्षण की प्रक्रिया अपनाए पेंशन से कटौती करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

परिणामस्वरूप न्यायालय ने 07.11.2025, 18.12.2025 तथा 13.01.2026 के वसूली आदेशों को निरस्त कर दिया, किन्तु राज्य को यह स्वतंत्रता दी कि वह विधि के अनुसार, राज्यपाल की वैध अनुमति प्राप्त कर, नवीन अनुशासनिक कार्यवाही प्रारंभ कर सकता है। इस प्रकार न्यायालय ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए न तो आरोपों की गंभीरता को कम आंका और न ही विधिक प्रक्रिया की अनदेखी को स्वीकार किया।

यह निर्णय प्रशासनिक कानून के उस मूल सिद्धांत को पुष्ट करता है कि “due process of law” केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि वैधानिक अनिवार्यता है। सेवानिवृत्ति के पश्चात कर्मचारी की पेंशन एक अर्जित अधिकार है, जिसे केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही सीमित किया जा सकता है। शासनादेश या आंतरिक पत्राचार, यदि वे वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप न हों, तो न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं सकते।

इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि यदि शासन किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी के विरुद्ध आर्थिक दायित्व निर्धारित करना चाहता है, तो उसे पहले राज्यपाल की विधिसम्मत स्वीकृति, तत्पश्चात आरोपपत्र, साक्ष्य, प्रतिरक्षा का अवसर और निष्पक्ष अनुशासनिक जांच की संपूर्ण प्रक्रिया अपनानी होगी। अन्यथा, न्यायालय ऐसे आदेशों को निरस्त करने में संकोच नहीं करेगा।