CRIMINAL REVISION No. – 1637 of 2025 at Allahabad : Ravinder Singh Bisht Vs. State of U.P. and Another
Date of Judgment/Order – 5/2/2026
Court Number – 85
Judgment Type – Final Non AFR
Coram – Hon’ble Madan Pal Singh,J.
Petitioner’s Counsels – Nitin Sharma and Parmeshwar Yadav
Respondent’s Counsel – Ravindra Kumar Mishra and G.A.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धारा 125 दंप्रसं (CrPC) का उद्देश्य केवल पत्नी को “भूखमरी” से बचाना भर नहीं है, बल्कि उसे पति की आर्थिक स्थिति और सामाजिक हैसियत के अनुरूप सम्मानजनक जीवन दिलाना भी है।
मामला क्या था
गाजियाबाद फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पति ने पुनरीक्षण याचिका दाखिल की थी। फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹15,000 प्रति माह भरण-पोषण (आवेदन की तिथि से) देने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
पति की दलीलें
पति का कहना था कि
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पत्नी पढ़ी-लिखी है और आमदनी रखती है, इसलिए उसे भरण-पोषण देना उचित नहीं।
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पत्नी ने स्वेच्छा से घर छोड़ा, वैवाहिक दायित्व नहीं निभाए और माता-पिता के साथ रहने को तैयार नहीं हुई।
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वह पारिवारिक परिस्थितियों (माता-पिता की बीमारी आदि) के कारण नौकरी छोड़ने/आय कम होने की बात भी कहता रहा।
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पत्नी की आय दिखाने के लिए आईटीआर (मई 2018) का हवाला दिया गया, जिसमें वार्षिक आय ₹11,28,780 बताई गई।
पत्नी का पक्ष
पत्नी ने कहा कि
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पति अपनी वास्तविक आय और जीवन-स्तर छिपा रहा है।
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रिकॉर्ड के अनुसार पति अप्रैल 2018 से अप्रैल 2020 के बीच JP Morgan में कार्यरत रहा और उसका वार्षिक पैकेज लगभग ₹40 लाख बताया गया।
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केवल इस आधार पर कि पत्नी कुछ आय दिखा रही है, उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर जब पति की आय कहीं अधिक हो।
हाईकोर्ट ने क्या कहा (मुख्य बात)
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने कहा कि
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धारा 125 CrPC का उद्देश्य पत्नी को केवल न्यूनतम गुजारे तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उसे सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित कराना है।
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पत्नी की आय/शिक्षा मात्र से भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता, विशेषकर जब पति की आय अधिक हो और आय में असमानता स्पष्ट हो।
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पति द्वारा “आय कम है” जैसी दलीलों को मानने के लिए विश्वसनीय/ठोस साक्ष्य आवश्यक होते हैं; केवल कथन पर्याप्त नहीं।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का ₹15,000/माह वाला आदेश बरकरार रखा और पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।