सेवा कानून और दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण निर्णय में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को सेवा के दौरान disability आने के बाद section 47 of the Persons with Disabilities Act, 1995 के तहत किसी अन्य उपयुक्त post या cadre में समायोजित किया जाता है, तो वह नए cadre में अपनी seniority पुराने पद पर की गई सेवा के आधार पर नहीं मांग सकता। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य कर्मचारी की नौकरी, pay scale और service benefits की रक्षा करना है, न कि उस नए cadre में पहले से कार्यरत कर्मचारियों की seniority को प्रभावित करना।
यह फैसला Rameshwar S/o Mahadeorao Surve v. State of Maharashtra & Ors., Writ Petition No. 6535 of 2024 में न्यायमूर्ति M. W. Chandwani ने दिया। निर्णय 8 जनवरी 2026 को reserve किया गया था और 26 मार्च 2026 को pronounce किया गया।
मामले के तथ्य यह थे कि याची की नियुक्ति वर्ष 2002 में Lab Technician के पद पर हुई थी। वर्ष 2010 में उसे low vision disability हो गई। इसके बाद उसने समान वेतनमान और अन्य सेवा लाभों के साथ किसी उपयुक्त पद पर समायोजन की मांग की। पूर्व वाद में न्यायालय के निर्देश के बाद उसे 16.06.2016 के appointment order द्वारा Extension Officer (Panchayat) के पद पर absorb किया गया और उसने 01.07.2016 से उस पद पर कार्यभार ग्रहण किया। बाद में promotion के लिए seniority list तैयार हुई तो उसने दावा किया कि नए cadre में उसकी seniority, Lab Technician के रूप में उसकी मूल नियुक्ति की तारीख से मानी जानी चाहिए।
अदालत ने याची का यह दावा स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि section 47 का पहला हिस्सा उस कर्मचारी को protection देता है जो सेवा के दौरान दिव्यांग हो जाता है, ताकि उसे नौकरी से हटाया न जाए, rank कम न की जाए, और उसे same pay scale तथा service benefits के साथ उपयुक्त पद पर समायोजित किया जा सके। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि नए cadre में पहले से कार्यरत कर्मचारियों की seniority को पीछे धकेल दिया जाए। कोर्ट ने साफ कहा कि reduction in rank और reduction in seniority दो अलग बातें हैं। reduction in rank वर्तमान पद, वेतन और status पर असर डालती है, जबकि seniority का प्रश्न मुख्यतः future promotion से जुड़ा होता है।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि promotion कोई vested right नहीं है। section 47(2) का आशय केवल इतना है कि किसी कर्मचारी को सिर्फ disability के कारण promotion से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि promotion न मिलने का कारण seniority, recruitment rules या minimum experience criteria है, तो section 47(2) का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। इस मामले में service rules के अनुसार संबंधित promotional post के लिए 7 वर्ष का अनुभव आवश्यक था, जबकि याची ने 01.01.2023 तक Extension Officer के पद पर यह न्यूनतम अनुभव पूरा नहीं किया था। इसलिए अदालत ने माना कि उसे disability के कारण नहीं, बल्कि नियमों और seniority की स्थिति के कारण promotion नहीं मिला।
कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि याची ने स्वयं Lab Technician के पद से Extension Officer (Panchayat) के पद पर जाने का अनुरोध किया था। उसे नए पद पर fresh appointment के रूप में absorb किया गया था और appointment order में यह शर्त भी थी कि उसे उस cadre की seniority list में tail-end पर रखा जाएगा। याची ने इस शर्त को स्वीकार करके छह वर्ष से अधिक समय तक उस पद पर काम किया और बाद में, जब promotion की प्रक्रिया शुरू हुई, तब seniority को चुनौती दी। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में वह दोनों लाभ एक साथ नहीं ले सकता।
याची ने अपने पक्ष में Kunal Singh v. Union of India तथा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के Sahib Singh निर्णय का सहारा लिया था। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि Kunal Singh का मामला discharge of employee after acquiring disability से संबंधित था, न कि किसी नए cadre में seniority पुनर्निर्धारण से। अदालत ने यह भी कहा कि Sahib Singh में Kunal Singh के सिद्धांत का विस्तार इस प्रकार किया गया जो वर्तमान मामले में सहायक नहीं है। साथ ही, बॉम्बे हाईकोर्ट की अपनी Division Bench का निर्णय Shyamkumar v. Union of India इस मामले में binding था।
अंततः अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि section 47 of the 1995 Act के तहत किसी दिव्यांग कर्मचारी को दूसरे cadre में shift करते समय उस cadre में पहले से कार्यरत कर्मचारियों की seniority disturb नहीं की जा सकती। इसलिए याची की Lab Technician के रूप में पिछली सेवा को Extension Officer (Panchayat) cadre में seniority तय करने के लिए नहीं जोड़ा जा सकता। इसी आधार पर writ petition dismiss कर दी गई।
यह निर्णय सेवा कानून के क्षेत्र में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि disability law का protective framework रोजगार सुरक्षा, pay protection और non-discrimination तक विस्तृत है, परंतु उसे इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि वह नए cadre की settled seniority structure को ही बदल दे। दूसरे शब्दों में, दिव्यांग कर्मचारी के अधिकारों की रक्षा और अन्य कर्मचारियों के accrued service rights, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।