सरकारी नौकरी से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि लोक रोजगार के मामलों में दया, सहानुभूति या उदारता के आधार पर नियमों को ढीला नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि भर्ती प्रक्रिया में किसी अभ्यर्थी को तय तिथि पर शारीरिक परीक्षा में उपस्थित होना था और वह स्वयं अनुपस्थित रहा, तो बाद में वह केवल इस आधार पर दूसरा मौका नहीं मांग सकता कि उसकी स्थगन-प्रार्थनाएं अधिकारियों ने नहीं सुनीं।
यह फैसला Commissioner, Delhi Police & Anr. v. Uttam Kumar, Civil Appeal No. 4150 of 2026 @ SLP (C) No. 12269/2026, निर्णय दिनांक 2 अप्रैल 2026 में न्यायमूर्ति Dipankar Datta और न्यायमूर्ति Satish Chandra Sharma की पीठ ने दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) और उसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिए गए राहत आदेश को रद्द कर दिया।
मामला क्या था
उत्तरदाता अभ्यर्थी ने दिल्ली पुलिस में Constable पद हेतु भर्ती प्रक्रिया के पहले चरण को सफलतापूर्वक पार कर लिया था। उसे भर्ती प्रक्रिया के अगले चरण, अर्थात Physical Endurance and Measurement Test (PE&MT), के लिए 14 जनवरी 2024 को उपस्थित होना था। लेकिन वह उस दिन परीक्षा में शामिल नहीं हुआ। उसने अनुपस्थिति का कारण सर्दी, खांसी, बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द और चक्कर बताया।
अभ्यर्थी का कहना था कि उसने परीक्षा की तिथि आगे बढ़ाने के लिए 13 जनवरी, 14 जनवरी और 25 जनवरी 2024 को तीन प्रार्थना-पत्र दिए थे। बाद में उसने CAT का दरवाजा खटखटाया। अधिकरण ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि उसे अगले बैच के साथ PE&MT में शामिल होने दिया जाए। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले भर्ती विज्ञापन की शर्तों पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि 1 सितंबर 2023 के विज्ञापन में स्पष्ट रूप से लिखा था कि PE&MT का कार्यक्रम अंतिम होगा और किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जाएगा। अदालत ने यह भी नोट किया कि इस भर्ती प्रक्रिया के लिए लगभग एक लाख के करीब अभ्यर्थियों ने पंजीकरण कराया था, लेकिन पुनर्निर्धारण की मांग करने वाला उत्तरदाता अकेला था।
कोर्ट ने उत्तरदाता की इस दलील पर भी संदेह जताया कि उसके प्रार्थना-पत्रों को अधिकारियों ने नजरअंदाज कर दिया। निर्णय में दर्ज है कि पहले आवेदन को संबंधित अधिकारी ने स्वीकार नहीं किया था, और बाकी आवेदनों के बारे में रिकॉर्ड पर यह स्पष्ट नहीं था कि वे वास्तव में संबंधित कार्यालय तक पहुंचे भी थे या नहीं। प्राप्ति की कोई विधिवत पुष्टि भी नहीं थी। इसलिए अदालत ने माना कि यह दावा संदेह से परे साबित नहीं हुआ।
पीठ ने यह भी कहा कि मान लिया जाए कि आवेदन प्राप्त हुए थे, तब भी उत्तरदाता का मामला ऐसा नहीं था जिसे “exceptional treatment” दिया जाए। अदालत के अनुसार, रिकॉर्ड से यह सामने आया कि अभ्यर्थी 13 जनवरी 2024 को भर्ती कार्यालय तक पहुंचा था। ऐसे में यह अपेक्षा की जा सकती थी कि वह 14 जनवरी 2024 को कम से कम स्थल पर उपस्थित होकर अपनी स्थिति बताता और वहीं पुनर्निर्धारण का अनुरोध करता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और वह पूरी तरह अनुपस्थित रहा, इसलिए उसे “ABSENT” चिह्नित किया जाना सही था।
“सरकारी नौकरी में compassion की जगह नहीं”
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक रोजगार के सिद्धांत पर व्यापक टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि लोक रोजगार दुर्लभ है, युवा इसके लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करते हैं, और ऐसे अवसर जीवन बदल देने वाले हो सकते हैं। इसलिए यदि मौका मिला है, तो उम्मीदवार को उसे गंभीरता से लेना चाहिए। अदालत ने कहा कि उत्तरदाता का आचरण ढिलाई और पहल की कमी दर्शाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क भी अस्वीकार कर दिया कि अभ्यर्थी पिछड़े समुदाय से था, इसलिए अधिकरण और हाईकोर्ट द्वारा उसके पक्ष में विवेकाधिकार का प्रयोग उचित था। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल किसी वर्ग-विशेष से संबंध होने भर से न्यायिक विवेक का पलड़ा उसके पक्ष में नहीं झुक सकता। इसी संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि “grace, charity or compassion” को सार्वजनिक रोजगार के मामलों से दूर रहना चाहिए, ताकि समान अवसर का निष्पक्ष मैदान सुरक्षित रखा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष
इन कारणों से सुप्रीम Court ने CAT का 7 जुलाई 2025 का आदेश और दिल्ली हाईकोर्ट का 3 सितंबर 2025 का निर्णय रद्द कर दिया। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि उत्तरदाता को PE&MT में दोबारा शामिल होने का कोई अधिकार नहीं था। पक्षकारों को अपने-अपने खर्च स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।
इस फैसले का महत्व
यह निर्णय भर्ती मामलों में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है कि नियमबद्ध सार्वजनिक चयन प्रक्रिया को व्यक्तिगत सहानुभूति के आधार पर नहीं बदला जा सकता। अदालत ने यह रेखांकित किया कि भर्ती प्रक्रिया में अनुशासन, समयपालन और व्यक्तिगत तत्परता अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर तब जब मामला पुलिस जैसे बल में भर्ती का हो। यह फैसला भविष्य के उन मामलों में उद्धृत किया जा सकता है, जहां अभ्यर्थी स्वयं परीक्षा या परीक्षण में उपस्थित नहीं होता और बाद में अदालत से विशेष राहत मांगता है।