राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि अनुकंपा नियुक्ति के लिए पहली अर्जी निर्धारित समयसीमा के भीतर दी गई थी, तो बाद में केवल इस आधार पर दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि बाद की अर्जी में देरी हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब नियोक्ता संस्था ने पहले आवेदन पर न तो कोई सकारात्मक आदेश पारित किया और न ही कोई अस्वीकृति आदेश दिया, तब उसी संस्थागत निष्क्रियता से पैदा हुई देरी को आवेदक के विरुद्ध इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
यह फैसला Vibhorgolash v. Union of India and Others, S.B. Civil Writ Petition No. 5025/2021, में 27 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति Ashok Kumar Jain ने दिया। कोर्ट ने 27 जुलाई 2020 के उस अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बैंक ने आवेदन को “inordinate delay” यानी अत्यधिक देरी बताकर ठुकरा दिया था। साथ ही बैंक को याची के मामले पर उपयुक्त पद के लिए पुनर्विचार करने और पात्र पाए जाने पर नियुक्ति प्रक्रिया 90 दिनों में पूरी करने का निर्देश दिया।
मामले के तथ्य
याची विभोर गोलाश के पिता, जो उस समय इलाहाबाद बैंक की जयपुर टोंक रोड शाखा में प्रबंधक थे, का 26 जनवरी 2015 को निधन हो गया। इसके बाद याची की माता ने बैंक की अनुकंपा नियुक्ति योजना के तहत समय पर आवेदन किया। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि याची को 15 जुलाई 2016 को व्यक्तिगत बातचीत के लिए बुलाया गया था। याची का कहना था कि उस समय उसे बताया गया कि यदि वह स्नातक पूरा कर ले तो उसे लिपिकीय पद के लिए विचार किया जा सकता है, अन्यथा सब-स्टाफ पद पर नियुक्ति संभव होगी। बाद में याची ने स्नातक पूरा कर 21 जनवरी 2020 को फिर आवेदन किया।
याची का मुख्य तर्क यह था कि बैंक ने पहले आवेदन या बाद की प्रक्रिया पर कभी कोई स्पष्ट आदेश पारित नहीं किया। न तो यह दिखाया गया कि उसे वास्तव में कोई पद औपचारिक रूप से ऑफर किया गया था, और न ही यह कि उसने ऐसा ऑफर अस्वीकार किया। दूसरी ओर, बैंक ने कहा कि पहले उसे सब-स्टाफ पद की पेशकश की गई थी, जिसे उसने स्वीकार नहीं किया, और बाद में की गई अर्जी बैंक की नीति के अनुरूप नहीं थी।
हाईकोर्ट ने क्या पाया
अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि 20 मार्च 2015 के प्रथम आवेदन, 15 जुलाई 2016 की व्यक्तिगत बातचीत, और 21 जनवरी 2020 के बाद भी बैंक ने कोई स्पष्ट सकारात्मक या नकारात्मक आदेश पारित नहीं किया। कोर्ट ने विशेष रूप से दर्ज किया कि 27 जुलाई 2020 से पहले ऐसा कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं है जिससे साबित हो कि याची का दावा पहले कभी अस्वीकार किया गया था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बैंक यह दिखाने में विफल रहा कि व्यक्तिगत बातचीत के बाद याची को वास्तव में सब-स्टाफ पद की औपचारिक पेशकश की गई थी और उसने उसे ठुकरा दिया। इसलिए बाद में देरी का आधार लेकर आवेदन खारिज करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, जब पहली अर्जी निर्धारित समयसीमा के भीतर दी गई थी और उस पर समय रहते निर्णय नहीं लिया गया, तब बाद की देरी को आवेदक के खिलाफ नहीं पढ़ा जा सकता।
कोर्ट की कानूनी टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि अनुकंपा नियुक्ति कोई अधिकार के रूप में दावा नहीं की जा सकती और उसका उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल राहत देना होता है। लेकिन साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि जब कोई सार्वजनिक प्राधिकरण निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है, तब न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। कोर्ट ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Jane Kaushik v. Union of India, 2025 INSC 1248 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई सार्वजनिक प्राधिकरण संवैधानिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने वाली अपनी वैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं करता, तो वह उसकी चूक मानी जाएगी।
निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण अंश यह है कि अदालत ने साफ कहा कि याची की पहली अर्जी बैंक की नीति के अनुसार समयसीमा के भीतर दी गई थी और मृत कर्मचारी की पत्नी द्वारा प्रायोजित भी थी। इसलिए केवल बाद की देरी का हवाला देकर अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज करना “settled norms” के विपरीत है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
यह निर्णय उन मामलों के लिए खास महत्व रखता है जहाँ सरकारी या अर्द्ध-सरकारी संस्थाएँ अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन को वर्षों तक लंबित रखती हैं और बाद में उसी देरी को आवेदक के खिलाफ आधार बना देती हैं। राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि प्रशासन अपनी ही निष्क्रियता का लाभ नहीं उठा सकता। यदि प्रारंभिक आवेदन समय पर था और संस्था ने उस पर उचित समय में निर्णय नहीं लिया, तो बाद की देरी अपने आप आवेदक के खिलाफ निर्णायक नहीं होगी।
निष्कर्ष
यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति के सिद्धांत को व्यापक नहीं बनाता, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता को मजबूत करता है। अदालत ने यह नहीं कहा कि हर देरी वाला मामला स्वीकार होगा। उसने केवल इतना कहा कि जहाँ पहली अर्जी समय पर दी गई हो और देरी का वास्तविक कारण संस्था की चुप्पी या निष्क्रियता हो, वहाँ बाद की देरी को आधार बनाकर दावा खारिज नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय सेवा कानून में निष्पक्ष प्रशासन, संगत निर्णय प्रक्रिया, और संस्थागत जवाबदेही का महत्वपूर्ण उदाहरण है।