बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया POCSO Act एक कठोर और विशेष कानून है। सामान्य सिद्धांत यही है कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे की सहमति कानूनन मान्य नहीं होती। फिर भी मेघालय हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि कुछ असाधारण परिस्थितियों में, जहाँ मामला वास्तव में किशोर-किशोरी के सहमति आधारित संबंध का हो और मुकदमे को जारी रखना न्याय के हित के विपरीत हो, वहाँ हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए धारा 528 BNSS के तहत कार्यवाही रद्द कर सकता है। अदालत ने साफ किया कि यह कोई सामान्य नियम नहीं है, बल्कि बहुत सीमित, अपवादस्वरूप और सावधानीपूर्ण अधिकार है।
यह निर्णय मेघालय हाईकोर्ट की खंडपीठ, Chief Justice Revati Mohite Dere और Justice H. S. Thangkhiew ने दिया। रिपोर्टों के अनुसार यह मामला एक ऐसे संदर्भ से जुड़ा था, जहाँ पहले एक एकलपीठ और पूर्व के एक अन्य निर्णय के बीच मतभेद उभरा था कि क्या POCSO जैसे विशेष अधिनियम के मामलों को भी पक्षकारों की सहमति के आधार पर quash किया जा सकता है। अदालत ने इस प्रश्न का उत्तर हाँ में दिया, लेकिन साथ ही जोड़ा कि यह शक्ति केवल “due care, caution and circumspection” के साथ ही प्रयोग की जानी चाहिए।
मामले के तथ्य क्या थे
रिपोर्ट के अनुसार, मामले में 22 वर्षीय युवक और 16 वर्षीय लड़की के बीच संबंध था। लड़की के गर्भवती होने के बाद 3 मई 2019 को FIR दर्ज हुई, जिसमें POCSO Act की sections 5(j)(ii) और 6 के आरोप लगाए गए। बाद में दोनों पक्ष हाईकोर्ट पहुँचे और कहा कि उनका संबंध सहमति से था, वे 2018 से साथ रह रहे थे, उनके एक बच्चा भी है, और लड़की की दादी, जो शिकायतकर्ता थीं, उन्होंने भी कार्यवाही समाप्त करने पर आपत्ति नहीं जताई।
अदालत ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने माना कि POCSO Act का उद्देश्य अत्यंत महत्वपूर्ण और संरक्षात्मक है तथा यह केवल निजी विवाद का कानून नहीं है। अदालत ने यह भी दोहराया कि नाबालिग की सहमति कानून में अप्रासंगिक है। लेकिन साथ ही अदालत ने यह भी देखा कि 16 से 18 वर्ष के आयु वर्ग में ऐसे अनेक मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ संबंध वास्तविक रूप से किशोर प्रेम संबंध के होते हैं, पर कानून की कठोर भाषा के कारण वे गंभीर आपराधिक मुकदमों में बदल जाते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में कानून का यांत्रिक और कठोर अनुप्रयोग कभी-कभी गंभीर अन्याय भी पैदा कर सकता है।
अदालत ने कहा कि धारा 528 BNSS के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति व्यापक है और इसका उद्देश्य न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति तथा न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है। इस संदर्भ में अदालत ने Gian Singh v. State of Punjab, Narinder Singh v. State of Punjab और Parbatbhai Aahir v. State of Gujarat जैसे सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का सहारा लिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर और जघन्य अपराधों में compromise-based quashing सामान्यतः स्वीकार्य नहीं होती, परंतु प्रत्येक मामले के तथ्यों का सूक्ष्म मूल्यांकन आवश्यक है।
“Romeo-Juliet” मामलों पर अदालत की दृष्टि
अदालत ने उन मामलों की ओर ध्यान दिलाया जिन्हें न्यायालयों में प्रायः “Romeo-Juliet cases” कहा जा रहा है, अर्थात ऐसे मामले जहाँ किशोर-किशोरी के बीच सहमति से संबंध होते हैं, लेकिन एक या दोनों की आयु 18 वर्ष से कम होने के कारण मामला POCSO के दायरे में आ जाता है। मेघालय हाईकोर्ट ने माना कि यदि ऐसे मामलों में अदालत केवल कानून की शब्दशः कठोरता पर चले और वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों, आयु के निकट अंतर, संबंध की स्वैच्छिक प्रकृति, तथा भविष्य के कल्याण की अनदेखी करे, तो परिणाम अनुपातहीन रूप से दंडात्मक हो सकता है।
किन बातों को महत्वपूर्ण माना गया
अदालत ने कोई कठोर फार्मूला तय नहीं किया, लेकिन यह संकेत दिया कि ऐसे मामलों में कुछ प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। जैसे:
- दोनों पक्षों की आयु और आयु का अंतर
- संबंध स्वैच्छिक था या नहीं
- कथित पीड़िता की सहमति स्वतंत्र और बिना दबाव की है या नहीं
- क्या दोनों विवाहित हैं या पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं
- क्या उनके बच्चे हैं
- मुकदमे को जारी रखने से पीड़िता और बच्चे के हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा
कुछ रिपोर्टों में यह भी उल्लेख है कि अदालत ने नो-ऑब्जेक्शन शपथपत्र, पीड़िता की स्वतंत्र इच्छा की पुष्टि, और कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा स्वतंत्र आकलन जैसे सुरक्षात्मक उपायों पर भी बल दिया, ताकि इस अधिकार का दुरुपयोग न हो।
मेघालय की सामाजिक पृष्ठभूमि पर विशेष टिप्पणी
इस निर्णय की एक खास बात यह रही कि हाईकोर्ट ने मेघालय की स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं को भी महत्व दिया। अदालत ने राज्य की matrilineal परंपराओं, cohabitation-based unions की सामाजिक मान्यता, और महिलाओं की अपेक्षाकृत अधिक सामाजिक स्वायत्तता का उल्लेख किया। अदालत का संकेत यह था कि न्याय को केवल अमूर्त सिद्धांतों में नहीं, बल्कि स्थानीय सामाजिक वास्तविकताओं के संदर्भ में भी समझना होगा।
अदालत का संतुलित संदेश
महत्वपूर्ण यह है कि हाईकोर्ट ने POCSO कानून को कमजोर नहीं किया। अदालत ने यह नहीं कहा कि सहमति होने पर POCSO लागू नहीं होगा। उसने केवल इतना कहा कि जहाँ मुकदमा वस्तुतः शोषण का नहीं, बल्कि किशोरावस्था के सहमति आधारित संबंध का हो, और जहाँ मुकदमे को जारी रखना पीड़िता, उसके बच्चे और दोनों परिवारों के लिए विनाशकारी अन्याय पैदा करे, वहाँ हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग कर सकता है। इसलिए यह निर्णय सामान्य छूट नहीं देता, बल्कि अदालतों को संवेदनशील, तथ्य-आधारित और अत्यंत सावधान दृष्टिकोण अपनाने की याद दिलाता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के सामने खड़े एक वास्तविक प्रश्न को स्वीकार करता है: क्या हर ऐसा मामला, जिसमें आयु 18 वर्ष से कम हो, बिना किसी अंतर के समान रूप से देखा जाना चाहिए, भले ही तथ्य किशोर प्रेम संबंध और दीर्घकालिक साथ रहने की ओर संकेत करते हों। मेघालय हाईकोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर सावधानी के साथ दिया है। उसने कानून की मूल संरचना को बरकरार रखते हुए यह माना कि न्याय केवल दंड नहीं, बल्कि न्यायसंगत परिणाम भी है।
निष्कर्ष
मेघालय हाईकोर्ट का यह निर्णय POCSO मामलों में एक मानवीय लेकिन सीमित न्यायिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। संदेश साफ है:
POCSO Act बच्चों की सुरक्षा के लिए है, पर उसका प्रयोग ऐसे ढंग से नहीं होना चाहिए कि वह कुछ असाधारण परिस्थितियों में स्वयं अन्याय का कारण बन जाए।
फिर भी अदालत ने यह उतनी ही स्पष्टता से कहा है कि धारा 528 BNSS के तहत quashing कोई routine remedy नहीं है। यह केवल उन्हीं मामलों के लिए है जहाँ तथ्य सचमुच अदालत को यह विश्वास दिलाएँ कि कार्यवाही जारी रखना “manifest injustice” को जन्म देगा।