इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा है कि किसी दोषी बंदी को केवल इस आधार पर पैरोल नहीं दी जा सकती कि वह अपने बेटे या बेटी की शादी तय करना चाहता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बंदी के खिलाफ अन्य आपराधिक मामले लंबित हैं, तो उत्तर प्रदेश के पैरोल नियमों के तहत वह पैरोल का लाभ पाने का पात्र नहीं होगा। यह फैसला Angad Yadav v. State of U.P. Thru. Its Prin. Secy. Home Deptt. and 4 Others, Criminal Misc. Writ Petition No. 848 of 2026 तथा संबद्ध याचिकाओं में 19 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति Rajesh Singh Chauhan और न्यायमूर्ति Rajeev Bharti की खंडपीठ ने दिया।
मामले में याचिकाकर्ता अंगद यादव ने पहले स्वास्थ्य और मानवीय आधार पर अल्पकालिक रिहाई की मांग की थी। बाद में उसने 60 दिन की पैरोल इस आधार पर मांगी कि उसे अपने बेटे और बेटी की शादी तय करनी है और खेती-बाड़ी का काम भी देखना है। राज्य सरकार ने दोनों मांगें अस्वीकार कर दीं। अदालत के समक्ष रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि दूसरी अर्जी 5 जुलाई 2025 को दी गई थी, जिसे 27 अक्टूबर 2025 को खारिज कर दिया गया।
अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश (बंदियों के दण्डादेश का निलम्बन) नियमावली, 2007 के Rule 3 में पैरोल देने के आधार सीमित रूप से बताए गए हैं। Rule 3(c) में पुत्र, पुत्री, भाई या बहन के विवाह के लिए पैरोल का प्रावधान है, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान केवल “विवाह संपन्न होने” की स्थिति को कवर करता है, न कि विवाह तय करने, रिश्ता खोजने या बातचीत करने के लिए। इसलिए केवल बेटे-बेटी की शादी तय करने के उद्देश्य से पैरोल की मांग नियमों के भीतर मान्य नहीं है।
रिकॉर्ड में जिला प्रशासन की रिपोर्ट में भी यह दर्ज था कि बंदी ने अपने पुत्र और पुत्री के विवाह तय करने के लिए पैरोल मांगी थी, जबकि विवाह पहले से तय नहीं था और विवाह की कोई निश्चित तिथि भी निर्धारित नहीं थी। इसी आधार पर स्थानीय प्रशासन ने पैरोल की संस्तुति नहीं की। हाईकोर्ट ने इस आकलन को गलत नहीं माना।
खेती-बाड़ी के आधार पर पैरोल की मांग भी अदालत ने स्वीकार नहीं की। Rule 3(d) के तहत कृषि कार्य के लिए पैरोल तभी दी जा सकती है जब उस कार्य के लिए कोई अन्य वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध न हो। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के तीन वयस्क बेटे हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि खेती के काम के लिए उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। इस कारण कृषि कार्य वाला आधार भी टिक नहीं सका।
फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अदालत ने Rule 1(4)(c) पर भी जोर दिया। इस नियम के अनुसार जिन बंदियों के खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला किसी न्यायालय में लंबित हो, उन पर यह नियम लागू नहीं होते। अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ नौ आपराधिक मामले लंबित थे और वह दो गंभीर मामलों में दोषसिद्ध भी हो चुका था। इस वजह से भी पैरोल से इनकार को अदालत ने उचित माना।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के फैसले Asfaq v. State of Rajasthan का भी उल्लेख किया और कहा कि पैरोल सुधारात्मक व्यवस्था अवश्य है, लेकिन इसका उपयोग करते समय समाज की सुरक्षा, लोक-शांति और अपराधी की प्रवृत्ति जैसे पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने संकेत दिया कि गंभीर अपराधों में दोषसिद्ध बंदियों के मामलों में अधिक सावधानी अपेक्षित है।
अंततः खंडपीठ ने माना कि सक्षम अधिकारियों ने प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करते हुए पैरोल से इनकार किया था और यह मामला पैरोल देने योग्य नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने याचिकाएं खारिज कर दीं।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि पैरोल कोई सामान्य पारिवारिक सुविधा नहीं है, बल्कि वह केवल उन्हीं परिस्थितियों में दी जा सकती है जिनका स्पष्ट उल्लेख नियमों में है। यदि विवाह केवल “तय” किया जाना हो, विवाह की तारीख निश्चित न हो, या बंदी के खिलाफ अन्य मुकदमे लंबित हों, तो पैरोल का दावा स्वतः स्वीकार्य नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में पैरोल से जुड़े मामलों में यह निर्णय आगे भी एक महत्वपूर्ण मिसाल की तरह उद्धृत किया जा सकता है।