शादी के झूठे वादे और सहमति से बने शारीरिक संबंधों से जुड़े मामलों में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टता दी है। अदालत ने कहा कि केवल इस वजह से कि बाद में शादी नहीं हुई, हर मामला अपने आप धारा 376 IPC के तहत रेप का मामला नहीं बन जाता। ऐसा अपराध तभी बन सकता है, जब पहली नज़र में यह दिखे कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था और वह केवल महिला की सहमति प्राप्त करने के लिए किया गया था।

यह फैसला Suraj Bora v. State of Uttarakhand and Another, Criminal Miscellaneous Application No. 2082 of 2023, में 11 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति आशीष नैथानी ने सुनाया। कोर्ट ने इस मामले में चार्जशीट दिनांक 22.07.2023, संज्ञान आदेश दिनांक 05.10.2023 और उससे उत्पन्न पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। यह मामला FIR No. 31 of 2023, थाना मसूरी, जिला देहरादून, के आधार पर दर्ज हुआ था, जिसमें IPC की धाराएँ 376, 323, 504 और 506 लगाई गई थीं।

मामले के अनुसार शिकायतकर्ता और आरोपी एक-दूसरे को जानते थे और लंबे समय से संबंध में थे। आरोप यह था कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर शिकायतकर्ता के साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि दोनों बालिग थे और उनके बीच संबंध काफी समय तक चला। अदालत ने इसी तथ्य को महत्वपूर्ण माना।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दो बालिगों के बीच लंबे समय तक सहमति से संबंध रहे हों, तो केवल बाद में रिश्ता टूट जाने या शादी न होने से सहमति स्वतः अवैध नहीं हो जाती। अदालत के अनुसार, रेप का मामला बनाने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि शुरुआत से ही आरोपी की मंशा धोखा देने की थी। यदि ऐसा कोई ठोस प्रारंभिक सामग्री न हो, तो मामला एक failed consensual relationship का हो सकता है, लेकिन उसे आपराधिक बलात्कार का रूप नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने खास तौर पर पाया कि न तो FIR और न ही चार्जशीट में ऐसा कोई विशिष्ट तथ्य था जिससे यह निष्कर्ष निकले कि आरोपी ने संबंध की शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं रखा था। इसके विपरीत, लंबे समय तक चला संबंध, लगातार संपर्क और स्वैच्छिक साथ रहना इस बात के खिलाफ गया कि यह शुरू से ही धोखे का मामला था। अदालत ने माना कि आरोपों को उनके सर्वोच्च रूप में भी स्वीकार कर लिया जाए, तब भी वे अधिक से अधिक एक ऐसा रिश्ता दिखाते हैं जो बाद में टूट गया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 482 CrPC के तहत हस्तक्षेप सामान्यतः सीमित होता है, लेकिन जहाँ निर्विवाद आरोप ही अपराध के आवश्यक तत्व स्थापित न करें, वहाँ आपराधिक मुकदमे को जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले में ट्रायल चलाना आवेदक को अनावश्यक उत्पीड़न में डालना होगा।

यह निर्णय एक महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है। अदालत ने यह नहीं कहा कि शादी के वादे पर बने हर शारीरिक संबंध में कभी रेप नहीं हो सकता। बल्कि कोर्ट ने केवल इतना कहा कि हर टूटे वादे को रेप नहीं माना जा सकता। यदि शुरुआत से धोखाधड़ी, झूठी मंशा या केवल सहमति हासिल करने के लिए किया गया झूठा वादा साबित हो, तो मामला अलग होगा। लेकिन जहाँ रिकॉर्ड केवल एक असफल प्रेम-संबंध दिखाता हो, वहाँ धारा 376 IPC का प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए। (

कानूनी दृष्टि से यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि यह “consent obtained by deception” और “relationship that later failed” के बीच स्पष्ट अंतर खींचता है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में यही कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल हर निजी संबंध-विवाद को दंडात्मक मुकदमे में बदलने के लिए नहीं किया जा सकता।