मोटर दुर्घटना मुआवज़ा मामलों में गृहणी के श्रम के आर्थिक मूल्य को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी गृहणी के योगदान को अकुशल मज़दूर के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह परिवार के लिए अनेक प्रकार की सेवाएं देती है, पूरे घर का प्रबंधन करती है, और यह सब बिना तय कार्य-घंटों या छुट्टी के करती है। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने दुर्घटना में मृत महिला के परिजनों को दिया गया मुआवज़ा बढ़ा दिया।
यह फैसला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, ग्वालियर पीठ की एकलपीठ ने 26 मार्च 2026 को Manoj and Others v. Arvind Kumar Jha and Others, Misc. Appeal No. 2978 of 2019 में दिया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Hirdesh ने की। अपील मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 की धारा 173(1) के तहत दायर की गई थी, जिसमें दावेदारों ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल, ग्वालियर द्वारा दिए गए मुआवज़े को अपर्याप्त बताते हुए वृद्धि की मांग की थी।
मामले में ट्रिब्यूनल ने पहले मृतका की आय ₹3,500 प्रति माह मानी थी। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि मृतका की आय के संबंध में कोई ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को अपर्याप्त माना। कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए कहा कि मृतका केवल महिला ही नहीं, बल्कि एक गृहणी भी थी, और गृहणी के काम को न्यूनतम स्तर पर आंकना न्यायसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि गृहणी का योगदान अकुशल मज़दूर के बराबर नहीं हो सकता। कोर्ट के अनुसार गृहणी परिवार को बहुआयामी सेवाएं देती है, पूरे घर को संभालती है, और उसके काम का आर्थिक मूल्य लंबे समय से न्यायालयों द्वारा मान्यता प्राप्त है। इसलिए उचित मुआवज़ा तय करते समय इस श्रम को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी माना कि भले ही मृतका के beautician के रूप में कार्य करने का कठोर दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध न हो, फिर भी उसकी आय का आकलन कम से कम semi-skilled lady के न्यूनतम वेतन के आधार पर किया जाना चाहिए था। अदालत ने संबंधित समय के लिए उसकी मासिक आय ₹5,975 मानी। इसके बाद कोर्ट ने Pranay Sethi के सिद्धांत के अनुसार 40 प्रतिशत future prospects जोड़े, और Sarla Verma के अनुसार 16 का multiplier लागू किया। साथ ही loss of consortium, loss of estate और funeral expenses भी जोड़े गए।
इन गणनाओं के आधार पर हाईकोर्ट ने कुल मुआवज़ा ₹12,20,720 निर्धारित किया। जबकि ट्रिब्यूनल ने पहले केवल ₹6,97,200 का मुआवज़ा दिया था। इस प्रकार हाईकोर्ट ने दावेदारों को ₹5,23,520 अतिरिक्त मुआवज़ा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बढ़ी हुई राशि पर वही ब्याज दर लागू होगी जो ट्रिब्यूनल ने निर्धारित की थी, और भुगतान प्रमाणित प्रति प्राप्त होने से तीन माह के भीतर किया जाए।
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय परिवार व्यवस्था में गृहणियों का श्रम अक्सर अदृश्य माना जाता है। अदालत ने एक बार फिर रेखांकित किया कि घरेलू काम, बच्चों और परिवार की देखभाल, भोजन, प्रबंधन और भावनात्मक श्रम जैसे कार्यों का वास्तविक आर्थिक मूल्य होता है। मोटर दुर्घटना दावों में यदि इन सेवाओं को मामूली या शून्य मान लिया जाए, तो वह न्यायपूर्ण मुआवज़े की अवधारणा के विपरीत होगा।
कानूनी दृष्टि से यह फैसला मोटर दुर्घटना दावों में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि गृहणी की आय का आकलन केवल औपचारिक वेतन-पर्ची के अभाव में कम नहीं किया जा सकता। न्यायालयों को उसके घरेलू योगदान, श्रम की प्रकृति और परिवार के लिए उसके वास्तविक आर्थिक महत्व को ध्यान में रखना होगा। यह फैसला मुआवज़ा कानून को अधिक यथार्थवादी और संवेदनशील दिशा में ले जाने वाला माना जाएगा।