आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सिर्फ इस आधार पर कि संपत्ति के स्वामित्व को लेकर सिविल विवाद लंबित है, किसी कब्जेदार या occupant को बिजली की सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी सक्षम न्यायालय का ऐसा स्पष्ट आदेश न हो, जो बिजली आपूर्ति पर रोक लगाता हो, तब तक बिजली काटना या सप्लाई देने से मना करना उचित नहीं है। यह फैसला जस्टिस निनाला जयसूर्या ने दिया।
यह मामला Shaik Shajahan Bee alias Shajahan alias Shajaha v. The Assistant Executive Engineer (Operations), Writ Petition No. 2270 of 2026, निर्णय दिनांक 24 मार्च 2026 का है। याचिकाकर्ता 62 वर्षीया महिला थीं, जो संबंधित संपत्ति पर कब्जे में थीं और वहां घरेलू तथा व्यावसायिक उपयोग के लिए अलग-अलग बिजली कनेक्शन चल रहे थे। रिकॉर्ड के अनुसार, बिजली कनेक्शन भले ही सातवें प्रतिवादी के नाम पर थे, लेकिन महिला अभी भी संपत्ति पर कब्जे में थीं और उन्हें विधि के अनुसार बेदखल नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी पक्ष के पास डिक्री है, तो उसे कानून के अनुसार निष्पादित कराया जाना चाहिए। डिक्री या स्वामित्व के दावे के नाम पर किसी occupant को बिजली कटवाकर परिसर खाली कराने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने साफ कहा कि “mere pendency of a civil litigation cannot be a ground” और जब तक occupant विधि अनुसार बेदखल न हो जाए, वह बिजली जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित नहीं की जा सकती।
न्यायालय ने यह भी दोहराया कि बिजली एक basic necessity है और यह गरिमापूर्ण जीवन से जुड़ी सुविधा है। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Dilip (Dead) through LRs. v. Satish and Others का उल्लेख करते हुए कहा गया कि बिजली प्राधिकरण को यह देखना है कि आवेदक परिसर के कब्जे में है या नहीं; केवल landlord या owner के NOC के अभाव में बिजली से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने K.C. Ninan v. Kerala State Electricity Board का भी हवाला दिया और माना कि बिजली की आपूर्ति owner या occupier, दोनों के संदर्भ में समझी जाती है।
मामले में अदालत ने व्यावहारिक संतुलन भी बनाया। हाईकोर्ट ने DISCOM प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता यदि उपयुक्त आवेदन दें, तो एक सप्ताह के भीतर घरेलू या व्यावसायिक उपयोग के अनुसार बिजली आपूर्ति बहाल की जाए और इसके लिए सातवें प्रतिवादी से NOC न मांगा जाए। हालांकि, अदालत ने यह शर्त भी लगाई कि याचिकाकर्ता को बिजली बहाली से पहले छह महीने के औसत उपभोग शुल्क के बराबर राशि जमा करनी होगी, आगे नियमित बिल जमा करने होंगे, और लगातार दो महीने भुगतान में चूक होने पर जमा राशि जब्त हो सकती है।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि बिजली का सवाल केवल title dispute का उप-उत्पाद नहीं है। स्वामित्व का विवाद अपनी जगह है, बेदखली की कार्यवाही अपनी जगह, लेकिन बिजली जैसी आवश्यक सेवा को दबाव के औजार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत का संदेश साफ है कि कानून से हटकर, सुविधा काटकर किसी को property से बाहर करने की कोशिश न्यायसंगत नहीं है।