गौहाटी हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि केवल इस आधार पर किसी आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती कि वह और कथित पीड़िता पहले प्रेम संबंध में थे, बाद में परिवारों के बीच समझौता हो गया, या भविष्य में विवाह की बात चल रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि महिला की इच्छा के विरुद्ध जबरन शारीरिक संबंध बनाने का आरोप है, तो ऐसा कृत्य आपराधिक प्रकृति का रहेगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने FIR और उससे आगे की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।

यह आदेश Hamedur Islam alias Hamidur Islam v State of Assam and Anr، Crl Pet/1608/2025 में गौहाटी हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रांजल दास द्वारा पारित किया गया। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार आदेश 25 मार्च 2026 का है। याचिका section 528 BNSS के तहत दाखिल की गई थी, जिसमें Fakirganj PS Case No 16/2025 और उससे संबंधित charge sheet No 44/2025 dated 30 April 2025 को रद्द करने की मांग की गई थी। मामला section 329(4), 64, 351(2) BNS तथा section 4 POCSO Act के तहत आगे बढ़ा था।

मामले के अनुसार, पीड़िता के पिता ने 1 फरवरी 2025 को FIR दर्ज कराई थी। आरोप था कि 29 जनवरी 2025 को जब लड़की घर में अकेली थी, तब आरोपी घर में घुसा, उसके साथ बलात्कार किया, और घटना किसी को न बताने की धमकी देकर भाग गया। FIR में यह भी कहा गया कि पीड़िता के कपड़े फटे हुए थे। बाद में आरोपी ने हाईकोर्ट में यह दलील दी कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था, परिवारों के बीच समझौता हो चुका है, और अब दोनों विवाह करना चाहते हैं, इसलिए कार्यवाही समाप्त कर दी जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि पीड़िता अब बालिग हो चुकी है और समझौते के बाद विवाद समाप्त माना जाना चाहिए। रिकॉर्ड में यह भी आया कि 30 मई 2025 का एक समझौता-पत्र आरोपी और सूचना देने वाले पिता के बीच हुआ था, जिसमें पिता ने quashing पर आपत्ति न होने की बात कही। लेकिन अभियोजन ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता ने अपने बयानों में आरोपी के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए हैं और ऐसे आरोप केवल समझौते के आधार पर समाप्त नहीं किए जा सकते।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों Narinder Singh v State of Punjab और State of Madhya Pradesh v Laxmi Narayan का हवाला देते हुए दोहराया कि हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे गंभीर अपराध महज निजी विवाद नहीं माने जा सकते। ऐसे अपराध समाज पर व्यापक प्रभाव डालते हैं, इसलिए केवल समझौते के आधार पर उन्हें आसानी से quash नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि quashing की शक्ति सावधानी से और बहुत सीमित परिस्थितियों में ही प्रयोग की जानी चाहिए।

निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था, जहाँ अदालत ने पीड़िता की भूमिका और उसके बयानों को केंद्र में रखा। अदालत ने पाया कि समझौता पीड़िता और आरोपी के बीच नहीं, बल्कि आरोपी और पीड़िता के पिता के बीच हुआ था। जबकि पीड़िता, जो अब बालिग है, उसके विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर कहा कि पुलिस और न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयानों में पीड़िता ने लगातार आरोपी पर बलात्कार का आरोप लगाया है और कहीं भी यह नहीं कहा कि संबंध उसकी सहमति से थे।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि केवल किसी पुरुष और महिला के बीच प्रेम संबंध होने से पुरुष को महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाने का कोई अधिकार नहीं मिल जाता। कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही देश में marital rape को लेकर विधिक स्थिति अलग हो, परंतु premarital love relationship में महिला की इच्छा के विरुद्ध बनाया गया शारीरिक संबंध फिर भी एक आपराधिक कृत्य है। यही इस फैसले का केंद्रीय सिद्धांत है।

गौहाटी हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड के अनुसार घटना के समय लड़की की उम्र लगभग 17 वर्ष बताई गई थी, जिससे मामला और गंभीर हो जाता है। अदालत ने माना कि उपलब्ध सामग्री prima facie गंभीर अपराध की ओर संकेत करती है। इसलिए inherent powers का उपयोग कर इस चरण पर आपराधिक कार्यवाही समाप्त करना न्यायोचित नहीं होगा। अंततः कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

कानूनी महत्व

यह फैसला तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, प्रेम संबंध अपने आप में consent का स्थायी या blanket proof नहीं है। दूसरा, परिवारों के बीच समझौता होने से बलात्कार जैसे गंभीर आरोप स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। तीसरा, quashing की कार्यवाही में अदालतें केवल समझौते को नहीं, बल्कि पीड़िता के बयान, अपराध की प्रकृति, और समाज पर उसके प्रभाव को भी निर्णायक रूप से देखती हैं।