जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 की धारा 3(1)(s) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए केवल इतना पर्याप्त नहीं है कि किसी व्यक्ति को गाली दी गई या केवल उसकी जाति का नाम ले लिया गया। अदालत ने कहा कि आरोपों से यह प्रथमदृष्टया दिखना चाहिए कि अपमान जाति के आधार पर, जाति के नाम से, और public view में किया गया था।

यह निर्णय Santosha Devi v. UT of J&K & Ors., CRM(M) No. 63/2026, में न्यायमूर्ति राजेश सेखरी ने 2 अप्रैल 2026 को सुनाया। मामला एक pre-arrest bail याचिका से जुड़ा था, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत से इनकार किए जाने के बाद हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया था।

मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उस पर हमला किया गया और उसे एक कथित जातिसूचक अपमानजनक शब्द कहकर नीचा दिखाया गया। FIR में BNS की धाराओं के साथ-साथ SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) भी लगाई गई थीं। जांच एजेंसी ने कुछ गवाहों के बयान और वीडियो सामग्री भी एकत्र की थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 3(1)(s) के लिए तीन बुनियादी तत्व महत्वपूर्ण हैं: पहला, आरोपी SC/ST समुदाय का सदस्य न हो; दूसरा, वह पीड़ित को जाति के नाम से अपमानित करे; और तीसरा, यह कृत्य public view में हुआ हो। अदालत ने साफ़ कहा कि सिर्फ़ सामान्य गाली या सिर्फ़ जाति का नाम लेना अपने-आप में अपराध नहीं बनाता। अपराध तब बनता है जब शब्दों में caste-based humiliation का तत्व हो और उनका उद्देश्य व्यक्ति को उसकी जातीय पहचान के कारण अपमानित करना हो।

लेकिन अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बात भी जोड़ी। उसने यह नहीं कहा कि केवल लंबे या विस्तृत जातिसूचक वाक्य ही अपराध बनाते हैं। उलटे, कोर्ट ने कहा कि यदि आवश्यक तत्व मौजूद हों, तो एक ही caste-based abusive word भी धारा 3(1)(s) को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है। इसलिए इस फैसले को यह कहकर नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि जातिसूचक अपमान के लिए हमेशा बहुत विस्तृत भाषा या अलग से प्रमाण चाहिए। असली कसौटी यह है कि क्या अपमान जाति-आधारित, जानबूझकर, और public view में था।

वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग और कथित प्रेस कॉन्फ्रेंस वीडियो को देखा। अदालत ने पाया कि रिकॉर्डिंग में झड़प और अफरा-तफरी तो दिखाई देती है, लेकिन धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के लिए आवश्यक जाति-आधारित अपमानजनक शब्द स्पष्ट रूप से सुनाई या प्रमाणित नहीं हो रहे थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस सामग्री में भी याचिकाकर्ता द्वारा जाति के नाम से अपमान करने की कोई साफ़ स्वीकारोक्ति नहीं मिली। इसी आधार पर अदालत ने कहा कि SC/ST Act के आरोपों के आवश्यक तत्व prima facie स्थापित नहीं होते और याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत दी जा सकती है।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दो स्तरों पर कानून को स्पष्ट करता है। पहला, SC/ST Act का उपयोग केवल किसी भी झगड़े या सामान्य गाली-गलौज के मामले में स्वतः नहीं किया जा सकता। दूसरा, जहां वास्तव में जातिसूचक अपमान हुआ हो, वहाँ यह तर्क भी स्वीकार नहीं होगा कि “सिर्फ़ एक शब्द बोला गया था, इसलिए अपराध नहीं बनता।” अदालत ने कानून की मर्यादा और उसके उद्देश्य, दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।