तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट या खबर को मात्र फॉरवर्ड कर देना, अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं बन जाता। अदालत ने कहा कि BNS section 353 के तहत अपराध तभी बन सकता है, जब अभियोजन यह दिखाए कि आरोपी की मंशा समाज में वैमनस्य फैलाने, भय या अशांति पैदा करने, या public tranquillity प्रभावित करने की थी।

यह फैसला Justice K. Sujana की पीठ ने Konatham Dhilip Kumar @ Konatham Dileep Reddy v. State of Telangana और उससे जुड़े मामले में 18 March 2026 को दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह विवाद Nakrekal Police Station की FIR No. 86 of 2025 और संबंधित FIR No. 87 of 2025 से जुड़ा था।

मामले में शिकायत यह थी कि कुछ YouTube चैनलों और मीडिया सामग्री में एक राजनीतिक नेता को SSC Telugu Board exam paper leak case से जोड़ा गया, और याचिकाकर्ताओं ने उस सामग्री को सोशल मीडिया पर आगे साझा किया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने कोई सामग्री बनाई नहीं थी, बल्कि केवल उसे आगे भेजा था, और उनके खिलाफ political rivalry के कारण कार्रवाई की गई।

हाईकोर्ट ने माना कि, भले ही आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मान लिया जाए, तब भी रिकॉर्ड से यह नहीं दिखता कि याचिकाकर्ताओं का उद्देश्य समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाना या लोक-शांति भंग करना था। अदालत ने इस आधार पर कहा कि केवल forwarding या circulation, बिना आवश्यक criminal intent के, section 353 के आवश्यक तत्व पूरे नहीं करती।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि एक ही घटना पर कई FIR दर्ज करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है। रिपोर्टों के अनुसार कोर्ट ने अपने पहले के connected order और T.T. Antony v. State of Kerala (2001) के सिद्धांत का भी सहारा लिया। अंततः हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी।

मुख्य takeaway:
सोशल मीडिया पर कोई सामग्री share या forward करने का मामला अपने आप में अपराध नहीं है। अभियोजन को यह दिखाना होगा कि forwarding के पीछे ऐसी दोषपूर्ण मंशा थी जो BNS के तहत दंडनीय परिणाम पैदा करती है। बिना mens rea के, criminal prosecution टिकना मुश्किल होगा।