कर्नाटक हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी-पूर्व प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि BNSS की धारा 35(3) के तहत दिया जाने वाला notice of appearance केवल WhatsApp या Email के माध्यम से वैध रूप से serve नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब कानून ने इस stage पर physical service को ही मान्यता दी है, तब न्यायालय या पुलिस electronic communication को उसका lawful substitute नहीं मान सकती।

यह फैसला Mr. Yugadev R v. State of Karnataka, Criminal Petition No. 981 of 2026, में 25 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति M. Nagaprasanna द्वारा कर्नाटक हाईकोर्ट, बेंगलुरु में सुनाया गया।

मामला Adugodi Police Station में दर्ज Crime No. 271/2025 से संबंधित था। अभियोजन के अनुसार, याचिकाकर्ता Mr. Yugadev R और उसकी पत्नी “Jai Bhairavi Devi Financial Solutions” नाम से निवेश जुटाने का काम कर रहे थे और निवेशकों को कथित रूप से लगभग 98 लाख रुपये का नुकसान हुआ। इसी आधार पर उनके खिलाफ Information Technology Act, 2000 की sections 66C और 66D तथा BNS की section 318(4) के तहत मामला दर्ज किया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि जब आरोप ऐसे अपराधों से संबंधित हैं जिनमें सजा सात वर्ष से कम है, तब BNSS section 35(3) के तहत विधिवत notice दिए बिना गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। यह भी कहा गया कि WhatsApp message या email द्वारा भेजी गई सूचना कानूनन पर्याप्त नहीं है, क्योंकि statute physical service की अपेक्षा करता है।

हाईकोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताई। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Satender Kumar Antil फैसले का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी-पूर्व notice एक महत्वपूर्ण procedural safeguard है और इसे casual या informal माध्यम से पूरा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि BNSS की section 530 में कुछ प्रक्रियाओं के लिए electronic communication का प्रावधान किया गया है, लेकिन section 35(3) के notice को उस दायरे में शामिल नहीं किया गया। इसलिए जहां legislature ने electronic mode expressly permit नहीं किया, वहां अदालत ऐसा mode जोड़ नहीं सकती।

हालांकि, इस मामले की विशेषता केवल इतनी नहीं थी कि WhatsApp या Email service को invalid बताया गया। अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए यह भी पाया कि पुलिस ने याचिकाकर्ता को लगभग 40 दिनों तक trace करके physical notice serve करने का प्रयास किया। इस दौरान वह लगातार पुलिस की पहुंच से बाहर रहा। बाद में जब उसे Cuddalore, Tamil Nadu में locate किया गया, तब भी उसने physical notice लेने से इंकार कर दिया। रिकॉर्ड के अनुसार, उसकी इसी non-cooperation के बाद 17 जनवरी 2026 को उसे custody में लिया गया।

इन्हीं तथ्यों के आधार पर अदालत ने कहा कि section 35(3) का notice rule है और arrest exception, लेकिन यदि आरोपी स्वयं notice receive करने से बचता है, investigation में cooperate नहीं करता, या physical notice लेने से इंकार करता है, तो उसकी यह conduct बाद की गिरफ्तारी को justify करने वाला relevant circumstance बन सकती है। इसलिए इस मामले में अदालत ने माना कि गिरफ्तारी को केवल इस आधार पर अवैध नहीं कहा जा सकता कि WhatsApp communication भी हुआ था, क्योंकि पुलिस ने physical service के लिए पर्याप्त प्रयास किए थे और आरोपी ने स्वयं सहयोग नहीं किया।

अंततः कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा that WhatsApp या Email section 35(3) BNSS के तहत वैध service नहीं हैं, लेकिन जहां आरोपी जानबूझकर notice से बचता है या उसे लेने से इंकार करता है, वहां वह बाद में उसी procedural protection का blanket benefit नहीं ले सकता। इसी reasoning के आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी और magistrate के आदेश में किसी प्रकार की illegality नहीं पाई।

यह फैसला दो महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है। पहला, BNSS section 35(3) के तहत notice की physical service आवश्यक है; WhatsApp या Email उसका lawful substitute नहीं हैं। दूसरा, यदि आरोपी notice से बचता है या physical service से इंकार करता है, तो उसकी गिरफ्तारी को केवल procedural objection के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती