राजस्थान हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तारी-पूर्व प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि CrPC की धारा 41A के तहत आरोपी को दिया जाने वाला notice of appearance केवल WhatsApp message भेजकर वैध रूप से serve नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि जब कानून किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी से पहले एक विधिसम्मत अवसर देता है, तब पुलिस उस statutory safeguard को informal electronic communication से replace नहीं कर सकती।
मामले में याचिकाकर्ता रवि मीणा के विरुद्ध FIR No. 346/2021 थाना Anti Corruption Bureau, Jaipur में दर्ज थी, जिसमें Prevention of Corruption (Amendment) Act, 2018 की sections 7 और 7-A तथा section 120-B IPC के आरोप थे। रिकॉर्ड के अनुसार, 25 जनवरी 2023 को जांच अधिकारी की ओर से केवल WhatsApp के माध्यम से उसे उपस्थित होने के लिए कहा गया। याचिकाकर्ता ने 30 जनवरी 2023 को उत्तर देकर अपनी पत्नी की बीमारी के कारण कुछ समय माँगा, लेकिन इसके बावजूद 1 फरवरी 2023 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस ने धारा 41A के अनुसार नोटिस की वैध सेवा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए। अदालत ने कहा कि ordinarily notice की personal service होनी चाहिए और यदि वह संभव न हो तो residence पर affixation या speed post जैसे recognized mode अपनाए जा सकते हैं। लेकिन इस मामले में इनमें से कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। इसलिए WhatsApp के जरिए भेजी गई सूचना को अदालत ने विधिसम्मत notice मानने से इनकार कर दिया।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि राजस्थान पुलिस महानिदेशक द्वारा जारी Standing Order No. 11/2022 में भी section 41A के notices को Chapter VI CrPC के अनुरूप formal manner में serve करने का निर्देश दिया गया था। इसके बावजूद वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने माना कि ऐसी कार्रवाई न केवल Arnesh Kumar v. State of Bihar के सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि यह व्यक्ति की personal liberty पर सीधा प्रहार भी है।
अंततः राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि respondent officer Pushpendra Singh Rathod ने सुप्रीम कोर्ट के binding directions की अवहेलना की है और इस कारण वह contempt के दोषी हैं। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि arrest procedure कानून की सीमाओं के भीतर और सावधानी से किया जाना चाहिए, न कि mechanical manner में। फैसले के अंत में कोर्ट ने sentencing के प्रश्न पर मामले को 6 अप्रैल 2026 के लिए सूचीबद्ध किया।
यह निर्णय एक मजबूत संदेश देता है कि गिरफ्तारी से पहले की प्रक्रिया कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि संविधान के Article 21 से जुड़ी सुरक्षा है। पुलिस यदि section 41A जैसे safeguards को हल्के में लेती है, तो अदालतें केवल arrest को ही नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही को भी गंभीरता से देखेंगी।