इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण के लिए बाध्य है, और हिंदू कानून में यह सिद्धांत इतना स्थापित है कि उपयुक्त परिस्थितियों में पति की मृत्यु के बाद विधवा को भी उसके अधिकारों से वंचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून ऐसी स्थिति में विधवा को, परिस्थितियों के अनुसार, दिवंगत पति की संपत्ति से तथा आवश्यकता होने पर ससुर से भी भरण-पोषण मांगने का अधिकार देता है।

यह टिप्पणी Akul Rastogi v. Shubhangi Rastogi, First Appeal Defective No. 212 of 2026 में की गई। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Arindam Sinha और न्यायमूर्ति Satya Veer Singh की खंडपीठ ने की। हाईकोर्ट का आदेश 17 मार्च 2026 का है।

मामला क्या था

यह मामला किसी विधवा के भरण-पोषण दावे से सीधे जुड़ा हुआ नहीं था। दरअसल, पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी पत्नी के खिलाफ perjury, यानी कथित झूठा बयान देने के आधार पर अभियोजन चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था।

पति का आरोप था कि पत्नी ने अपने maintenance claim में अपने बारे में गलत तथ्य प्रस्तुत किए। उसके अनुसार, पत्नी ने स्वयं को गृहिणी बताया, जबकि वह कथित रूप से काम करती थी। साथ ही, पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने अपनी fixed deposits के बारे में सही जानकारी नहीं दी। फैमिली कोर्ट ने 6 फरवरी 2026 को यह आवेदन खारिज कर दिया, जिसके विरुद्ध यह अपील दाखिल की गई।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के रोजगार में होने का आरोप लगाने वाले पति पर ही इसका साक्ष्य प्रस्तुत करने का भार था। केवल आरोप लगा देने से perjury सिद्ध नहीं हो जाती। अदालत ने यह भी माना कि पत्नी के नाम पर जो FDRs थीं, वे उसके पिता द्वारा बनाई गई थीं।

कोर्ट के अनुसार, उपलब्ध रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि पत्नी आर्थिक रूप से इतनी सक्षम थी कि उसे maintenance की आवश्यकता ही न हो। इसके विपरीत, रिकॉर्ड से यह प्रतीत हुआ कि वह अपने निर्वाह के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता में थी।

इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराया कि पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण के लिए बाध्य है। अदालत ने कहा कि हिंदू कानून में यह सिद्धांत इतना व्यापक है कि आवश्यक परिस्थितियों में पति की मृत्यु के बाद भी विधवा को ससुर से maintenance मांगने का अधिकार प्राप्त हो सकता है

अदालत ने यह भी कहा कि किसी दस्तावेज का केवल वही हिस्सा अपने पक्ष में पढ़ना और बाकी हिस्से को नजरअंदाज कर देना, साक्ष्य के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है

अपील खारिज

खंडपीठ ने पाया कि perjury के आरोप के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी तथ्य का suppression हर मामले में अपने-आप झूठा बयान नहीं माना जा सकता। इन कारणों से हाईकोर्ट ने अपील को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया।

इस फैसले का महत्व

यह निर्णय मुख्य रूप से perjury application से जुड़ा था, न कि किसी actual widow maintenance claim से। फिर भी, इस आदेश में हाईकोर्ट ने भरण-पोषण कानून के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराया कि पत्नी के निर्वाह का दायित्व भारतीय पारिवारिक कानून में गंभीरता से देखा जाता है।

साथ ही, अदालत की टिप्पणी यह भी स्पष्ट करती है कि हिंदू कानून में, उपयुक्त परिस्थितियों में, विधवा के भरण-पोषण के अधिकार को भी मान्यता प्राप्त है। इसलिए इस फैसले का महत्व इस बात में है कि यह पति-पत्नी के maintenance law के व्यापक सिद्धांतों को रेखांकित करता है, भले ही मामले के तथ्य सीधे तौर पर विधवा के दावे से संबंधित न रहे हों।