आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी हिंदू महिला को अपने पिता या माता से संपत्ति विरासत में मिली हो, और उसकी मृत्यु बिना वसीयत तथा बिना संतान के हो जाए, तो उस संपत्ति पर पति का अधिकार नहीं होगा। ऐसी स्थिति में संपत्ति पति या उसके वारिसों को नहीं, बल्कि महिला के पिता के कानूनी वारिसों को जाएगी। कोर्ट ने यह निष्कर्ष हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(2)(a) के आधार पर निकाला।

यह फैसला Chikkala Devika Manasa v. The State of AP, Writ Petition No. 12421 of 2023 में न्यायमूर्ति Tarlada Rajasekhar Rao ने 17 मार्च 2026 को सुनाया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि संपत्ति महिला को उसके पिता या माता से मिली है और उसकी कोई संतान नहीं है, तो वह संपत्ति उसके पिता के वारिसों को जाएगी, पति को नहीं।

क्या था मामला

मामला आंध्र प्रदेश के अनकापल्ली जिले की एक भूमि से जुड़ा था। रिकॉर्ड के अनुसार, मूल स्वामिनी Chikkala Venkayamma ने वर्ष 2002 में अपनी पोती Srivirita के पक्ष में लगभग 1.50 एकड़ भूमि का गिफ्ट सेटलमेंट डीड किया था। बाद में राजस्व अभिलेखों में भी Srivirita का नाम दर्ज हो गया। इसके बाद 27 नवंबर 2005 को Srivirita की मृत्यु हो गई और उसकी कोई संतान नहीं थी। फिर मूल स्वामिनी ने 2007 में पहले वाले गिफ्ट डीड को निरस्त कराया और 2011 में दूसरी पोती Devika Manasa के पक्ष में वसीयत कर दी।

विवाद तब खड़ा हुआ जब मृतक Srivirita के पति Badireddy Naga Veera Venkata Srirama Dora ने उस संपत्ति पर अधिकार जताया। राजस्व अधिकारियों के स्तर पर मामला अलग-अलग चरणों से गुजरा। पहले तहसील स्तर पर पति के पक्ष में स्थिति बनी, फिर Revenue Divisional Officer ने 10 अक्टूबर 2017 के आदेश से Devika Manasa के पक्ष में नाम दर्ज करने का रास्ता साफ किया। लेकिन बाद में Joint Collector ने उस आदेश को पलट दिया। इसके विरुद्ध याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने क्या कहा

हाई कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(2)(a) का हवाला देते हुए कहा कि यह एक विशेष प्रावधान है। सामान्य नियम यह है कि किसी महिला की मृत्यु बिना वसीयत होने पर उसकी संपत्ति धारा 15(1) के अनुसार आगे बढ़ती है। लेकिन जहां संपत्ति महिला को उसके पिता या माता से विरासत में मिली हो, वहां धारा 15(2)(a) लागू होगी। इस विशेष स्थिति में, यदि महिला की कोई संतान नहीं है, तो संपत्ति पिता के वारिसों को जाएगी। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि पति को ऐसी संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलता

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि धारा 15(2)(a) का सीधा अर्थ यह है कि “property of the deceased shall go to the legal heirs of father. The husband will not get any right over the property inherited by her from her father.” अदालत ने यह भी माना कि जब पति को कानूनन कोई अधिकार ही प्राप्त नहीं था, तब वह उस संपत्ति के संबंध में दावा करने या मूल दानकर्ता द्वारा की गई कार्रवाई को चुनौती देने का हकदार नहीं था।

अदालत ने किस आधार पर पति का दावा खारिज किया

कोर्ट ने माना कि मृत महिला के पति ने अपनी पत्नी से ऐसा कोई स्वतंत्र शीर्षक प्राप्त नहीं किया था जिससे वह संपत्ति पर दावा कर सके। चूंकि कानून स्वयं कहता है कि इस तरह की संपत्ति पिता के वारिसों को जाएगी, इसलिए पति का दावा टिकाऊ नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में Joint Collector ने गलत दृष्टिकोण अपनाया था, जबकि राजस्व मंडल अधिकारी का आदेश सही था। इसी कारण हाई कोर्ट ने 01 अप्रैल 2023 के Joint Collector के आदेश को रद्द कर दिया और 10 अक्टूबर 2017 के RDO आदेश को बरकरार रखा। साथ ही तहसीलदार को Devika Manasa का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक बार फिर स्पष्ट करता है that मायके से मिली संपत्ति का उत्तराधिकार सामान्य वैवाहिक संबंधों के आधार पर तय नहीं होगा, बल्कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के विशेष प्रावधानों के अनुसार तय होगा। विशेष रूप से, जहां महिला निसंतान हो और उसने कोई वसीयत न छोड़ी हो, वहां पति का दावा स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में अदालतें संपत्ति के स्रोत को देखेंगी, यानी संपत्ति महिला को कहां से मिली थी। यदि वह संपत्ति उसके पिता या माता से आई थी, तो धारा 15(2)(a) लागू होगी।

आसान भाषा में समझिए

इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि हर स्थिति में पति को पत्नी की मायके वाली संपत्ति पर अधिकार नहीं माना जाएगा। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने खास तौर पर उस स्थिति पर फैसला दिया, जहां महिला को संपत्ति माता-पिता के परिवार से मिली थी, महिला की कोई संतान नहीं थी, और उसकी मृत्यु बिना वसीयत हुई थी। ऐसी स्थिति में कानून पति को प्राथमिक अधिकार नहीं देता, बल्कि संपत्ति को वापस महिला के पैतृक वारिसों की ओर मोड़ देता है।

निष्कर्ष

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला महिलाओं की पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े कानून को साफ और सख्त तरीके से सामने रखता है। अदालत ने साफ कर दिया कि मायके से मिली विरासत पति की संपत्ति नहीं बन जाती। यदि महिला निसंतान और बिना वसीयत मरती है, तो ऐसी संपत्ति पर पति का नहीं, पिता के वारिसों का अधिकार होगा। यह फैसला भविष्य में ऐसे कई पारिवारिक और उत्तराधिकार विवादों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित हो सकता है।