इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप अपने आप में कोई अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का पार्टनर चुनने और उसके साथ गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि वह हर अंतरधार्मिक संबंध या सहजीवन को स्वतः अवैध बना दे।
यह फैसला Noori and Another v. State of U.P. and 4 Others, 2026, निर्णय दिनांक 23.02.2026, में न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह द्वारा दिया गया। बाद के एक आदेश Kajal Prajapati and Another v. State of U.P. and 3 Others, WRIT-C No. 3667 of 2026 में भी इसी सिद्धांत को दोहराया गया।
मामला क्या था
कोर्ट के समक्ष ऐसे अंतरधार्मिक जोड़ों की याचिकाएँ आई थीं जो लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे और उन्हें अपने परिजनों तथा अन्य निजी व्यक्तियों से जान-माल के खतरे की आशंका थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने पुलिस से संपर्क किया, लेकिन अपेक्षित सुरक्षा नहीं मिली, इसलिए उन्हें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
कोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जीवनसाथी या पार्टनर चुनने का अधिकार केवल सामाजिक पसंद का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट के अनुसार, जब दो बालिग व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रहना चाहते हैं, तब उनके निजी संबंध में अनावश्यक हस्तक्षेप करना उनके मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण होगा।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि U.P. Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 का उद्देश्य हर अंतरधार्मिक संबंध को रोकना नहीं है। अदालत ने कहा कि धारा 3 और 5 के तहत दंडात्मक परिणाम तब सामने आते हैं जब धर्म परिवर्तन बल, प्रलोभन, कपट, दबाव या विवाह अथवा विवाह-सदृश संबंध के माध्यम से कराया गया हो। यदि ऐसा आरोप ही नहीं है, तो मात्र इस कारण कि दो अलग-अलग धर्मों के बालिग व्यक्ति साथ रह रहे हैं, उनके संबंध को अपराध नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने आगे कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे अधिनियम की धारा 8 और 9 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। लेकिन केवल विवाह या सहजीवन के कारण यह मान लेना कि कोई अवैध धर्म परिवर्तन हो रहा है, कानून की गलत समझ होगी।
अनुच्छेद 21 के दायरे को फिर किया मजबूत
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 21 को फिर से एक जीवंत और व्यापक अधिकार के रूप में पढ़ा। अदालत ने माना कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि अपनी पसंद से, गरिमा के साथ, स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार भी है। इसी कारण कोर्ट ने कहा कि अंतरधार्मिक संबंध में होने मात्र से किसी नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने अनुच्छेद 14 और 15 की भी चर्चा की और संकेत दिया कि राज्य किसी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। इस तरह यह निर्णय केवल लिव-इन रिलेशनशिप पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की स्वायत्तता, समानता और संवैधानिक नैतिकता पर भी एक मजबूत टिप्पणी है।
राज्य का दायित्व क्या है
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे। यदि कोई बालिग जोड़ा केवल अपने संबंध के कारण धमकियों का सामना कर रहा है, तो प्रशासन मूकदर्शक नहीं रह सकता। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित पुलिस अधिकारियों के समक्ष आवेदन देने की स्वतंत्रता दी और निर्देश दिया कि यदि जांच में खतरा सही पाया जाए, तो उन्हें आवश्यक सुरक्षा प्रदान की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कहीं जबरन धर्म परिवर्तन का वास्तविक मामला हो, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
फैसले का व्यापक महत्व
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब अंतरधार्मिक संबंधों, विशेषकर लिव-इन रिलेशनशिप, को लेकर सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर अनेक भ्रम बने रहते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस फैसले से यह स्पष्ट कर दिया कि कानून और सामाजिक असहमति एक ही चीज नहीं हैं। किसी संबंध को समाज का एक वर्ग पसंद न करे, यह अलग बात है; लेकिन जब तक उसमें कोई वैधानिक अपराध का तत्व न हो, तब तक राज्य या परिवार को बालिग व्यक्तियों की पसंद पर अंकुश लगाने का अधिकार नहीं है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक अवधारणा को मजबूत करता है। अदालत ने साफ कर दिया कि अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप अपराध नहीं है, और पार्टनर चुनने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है। यह फैसला न केवल अंतरधार्मिक जोड़ों के अधिकारों की पुष्टि करता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि भारतीय संविधान व्यक्ति की गरिमा, पसंद और स्वतंत्रता को सामाजिक पूर्वाग्रहों से ऊपर रखता है।