मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण की अर्जी उस समय दायर की गई थी जब बेटी नाबालिग थी, तो केवल इस आधार पर उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि कार्यवाही लंबित रहने के दौरान वह बालिग हो गई। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बेटी की शैक्षणिक आवश्यकताओं और उसके भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसे उस अवधि के लिए भरण-पोषण दिलाया जा सकता है, जब तक वह नाबालिग थी। यह फैसला Smt. Abhida and Others v. Ajay तथा संबद्ध वाद Ajay Solanki v. Smt. Abhida and Others, CRR No. 5558 of 2025 एवं CRR No. 608 of 2025, Neutral Citation 2026:MPHC-IND:8586, में 1 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति Gajendra Singh ने सुनाया।
मामले में पत्नी और बेटी ने फैमिली कोर्ट, रतलाम के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें धारा 125 Cr.P.C. के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा खारिज कर दिया गया था। दूसरी ओर, पति ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत बेटी के पक्ष में अंतरिम भरण-पोषण के रूप में रु. 6,000 प्रति माह दिया गया था। हाईकोर्ट ने दोनों आपराधिक पुनरीक्षणों को एक साथ सुनकर समान आदेश से निस्तारित किया।
अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि पति-पत्नी का विवाह 23 जनवरी 2006 को हुआ था। बेटी का जन्म 8 दिसंबर 2007 को हुआ और बाद में एक पुत्र का जन्म भी हुआ, जो पति के साथ रह रहा था, जबकि बेटी पत्नी के साथ रह रही थी। पत्नी ने 14 मार्च 2024 को भरण-पोषण की अर्जी दायर कर अपने और बेटी के लिए राशि मांगी थी। रिकॉर्ड में यह भी है कि पत्नी ने कहा कि वह स्कूल में कार्यरत है, पर उसकी आय घर, किराया, यात्रा, दैनिक जरूरतों और बेटी की पढ़ाई के लिए पर्याप्त नहीं है, जबकि पति स्वयं को सिविल इंजीनियर बताता है।
फैमिली कोर्ट ने पत्नी की आय को देखते हुए यह माना था कि वह अपना भरण-पोषण स्वयं कर सकती है। हाईकोर्ट ने इस हिस्से में दखल नहीं दिया। अदालत ने पत्नी की नवंबर 2024 की वेतन पर्ची का उल्लेख करते हुए कहा कि उसका ग्रॉस वेतन रु. 59,106 और नेट वेतन रु. 52,833 था। पत्नी ने यह भी कहा था कि वह रु. 6,500 किराया और लगभग रु. 100 प्रतिदिन यात्रा खर्च दे रही है। इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी के लिए फैमिली कोर्ट का निष्कर्ष हस्तक्षेप योग्य नहीं है।
लेकिन बेटी के मामले में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की दृष्टि को अत्यधिक तकनीकी बताया। अदालत ने कहा कि धारा 125 Cr.P.C. के अनुसार नाबालिग बेटी को भरण-पोषण का अधिकार है, और यदि आवेदन उसकी अल्पायु में दायर हो चुका था, तो केवल इसलिए उसे वंचित नहीं किया जा सकता कि मुकदमे के दौरान वह 18 वर्ष की हो गई। अदालत ने इस बिंदु पर साफ कहा कि लंबित कार्यवाही के दौरान आयु-सीमा पार हो जाना, पहले से बने अधिकार को अपने आप समाप्त नहीं करता।
हाईकोर्ट ने पत्नी के शपथ-पत्रीय बयान को पर्याप्त माना, जिसमें कहा गया था कि बेटी ने विज्ञान वर्ग (Biology) से हायर सेकेंडरी परीक्षा उत्तीर्ण की है, वह NEET की तैयारी कर रही है, और इसके लिए SAFAL Academy, Ratlam में कोचिंग ले रही है, जिस पर रु. 60,000 से 70,000 प्रतिवर्ष का खर्च आ रहा है। अदालत ने कहा कि यह बयान स्वयं में साक्ष्य है और फैमिली कोर्ट ने यह कहकर गलती की कि पढ़ाई या खर्च का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं दिया गया।
निर्णय में अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पिता पुत्र के खर्च उठा रहा है, तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह बेटी को उचित शिक्षा से वंचित कर दे। कोर्ट ने कहा कि जीवन की भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए बेटी को मानक स्तर की शिक्षा मिलना आवश्यक है, और इस चरण में शैक्षणिक आवश्यकताएं अपेक्षाकृत अधिक होती हैं। पति ने ट्रायल कोर्ट में स्वयं गवाही देने से परहेज किया था, जिसे भी अदालत ने ध्यान में रखा।
इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने बेटी को अप्रैल 2024 से दिसंबर 2025 तक, कुल 21 महीनों के लिए रु. 15,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जो अंतरिम भरण-पोषण पहले से दिया जा चुका है, उसका समायोजन किया जाएगा। साथ ही, पति द्वारा दायर पुनरीक्षण, जिसमें बेटी को दिए गए अंतरिम भरण-पोषण को चुनौती दी गई थी, उसे अदालत ने निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
यह फैसला पारिवारिक न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को पुष्ट करता है कि भरण-पोषण कानून का उद्देश्य केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन और शिक्षा के अवसर सुनिश्चित करना भी है। विशेषकर बेटियों की शिक्षा के संदर्भ में अदालत ने यह संदेश दिया है कि न्यायालय केवल तकनीकी आयु-सीमा नहीं देखेगा, बल्कि यह भी देखेगा कि दावा कब उत्पन्न हुआ, बच्ची की वास्तविक जरूरतें क्या थीं, और पिता की कानूनी जिम्मेदारी किस हद तक बनती है।