इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता की पेशेवर जिम्मेदारी और न्यायालय के प्रति ईमानदारी को लेकर एक कड़ा संदेश देते हुए एक वकील पर 20,000 रुपये की लागत लगाई। अदालत ने पाया कि संबंधित अधिवक्ता ने एक मामले में अपनी बीमारी की पर्ची भेजकर स्थगन का माहौल बनाया, जबकि उसी दिन वह दूसरे मामले में दूसरी बेंच के समक्ष उपस्थित थे। कोर्ट ने इसे न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास माना।
यह आदेश न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी ने 24 मार्च 2026 को पारित किया। मामला Arun Kumar Yadav v. State of U.P. and Another से संबंधित था, जिसके साथ एक connected anticipatory bail application भी सुनी गई। यह वाद Criminal Misc. Anticipatory Bail Application U/S 482 BNSS No. 2375 of 2025 तथा connected No. 2551 of 2025 के रूप में दर्ज था।
मामले में आवेदकों अरुण कुमार यादव और शिव प्रकाश सिंह ने अग्रिम जमानत की मांग की थी। यह प्रकरण वाराणसी के कैंट थाने में दर्ज एक मुकदमे से जुड़ा था, जिसमें IPC की धाराएँ 420, 467, 468 और 471 लगाई गई थीं। लेकिन सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि आवेदकों को इसी विवाद से जुड़े एक अन्य प्रकरण में पहले ही 18 सितंबर 2025 को अंतरिम संरक्षण मिल चुका था। ऐसे में हाईकोर्ट ने कहा कि जब पहले से ही संरक्षण प्राप्त है, तब गिरफ्तारी की वास्तविक आशंका नहीं बनती और अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र स्वीकार नहीं किए जा सकते।
सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आवेदकों के वकील ने इस कोर्ट में illness slip भेजी है, लेकिन उसी समय वह Special Appeal Defective No. 66 of 2026 में माननीय मुख्य न्यायाधीश की अदालत के समक्ष उपस्थित हुए थे। इस संबंध में appearance slip भी कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की गई, जिसे रिकॉर्ड पर लिया गया। अदालत ने इस तथ्य को अत्यंत गंभीरता से लिया।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि वर्ष 2025 की पहली तिमाही से लंबित इन अग्रिम जमानत आवेदनों में या तो बार-बार स्थगन लिया गया, या फिर आवेदकों के अधिवक्ता अनुपस्थित रहे। अदालत ने कहा कि वकील ने न केवल मामले की सही स्थिति कोर्ट को नहीं बताई, बल्कि उस तथ्य को भी छिपाया कि आवेदकों को पहले से अंतरिम संरक्षण प्राप्त था। अदालत के अनुसार ऐसा आचरण न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालता है और न्यायालय के बहुमूल्य समय की बर्बादी करता है।
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि अधिवक्ता, “officer of the Court” होने के नाते, न्यायालय की सहायता सत्य तथ्यों के साथ करने के लिए बाध्य है। यदि कोई अधिवक्ता बीमारी का कारण बताकर अनुपस्थित होने का संकेत दे, लेकिन उसी समय दूसरी अदालत में पेश हो, तो यह केवल व्यक्तिगत आचरण का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि न्याय प्रशासन की शुचिता पर भी असर डालता है। अदालत ने इसीलिए इसे “attempt to deceive the Court” माना और 20,000 रुपये की लागत अधिरोपित की।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि एक महीने के भीतर High Court Legal Services Committee, Allahabad के समक्ष जमा की जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि तय समय में लागत जमा नहीं की जाती, तो मामला आगे की उचित कार्रवाई हेतु उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को संदर्भित किया जाएगा।
यह आदेश केवल एक वकील पर Cost लगाने तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक संदेश यह है कि न्यायालय के समक्ष पेशेवर सत्यनिष्ठा अनिवार्य है। बीमारी की पर्ची, स्थगन आवेदन, अनुपस्थिति या प्रक्रिया संबंधी किसी भी आग्रह का उपयोग यदि अदालत को भ्रमित करने के लिए किया जाएगा, तो हाईकोर्ट उसे हल्के में नहीं लेगा। यह आदेश बार और बेंच के बीच विश्वास, पेशेवर नैतिकता और न्यायिक समय के महत्व को रेखांकित करता है।