वैवाहिक विवादों में अक्सर स्त्रीधन को लेकर गंभीर आपराधिक आरोप लगा दिए जाते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में महत्वपूर्ण स्पष्टता देते हुए कहा है कि पत्नी अपने स्त्रीधन की पूर्ण स्वामिनी होती है। यदि वह अपने स्त्रीधन पर नियंत्रण रखती है या उसे अपने साथ ले जाती है, तो मात्र इसी आधार पर उसके खिलाफ धारा 406 आईपीसी के तहत आपराधिक विश्वासभंग का मामला नहीं बनाया जा सकता।

यह फैसला न्यायमूर्ति चावन प्रकाश की पीठ ने Anamika Tiwari and 4 Others vs. State of U.P. and Another, Application U/S 482 No. 37453 of 2024, निर्णय दिनांक 16 मार्च 2026, में दिया। हाईकोर्ट ने न केवल समन आदेश को गलत पाया, बल्कि पूरी आपराधिक कार्यवाही ही निरस्त कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि पति ने शिकायत की कि पत्नी और उसके परिजन घर में आए और नकदी, गहने तथा घरेलू सामान ले गए। मजिस्ट्रेट ने इस शिकायत पर पत्नी और अन्य आरोपियों को धारा 323, 504 और 406 आईपीसी के तहत तलब कर लिया। पत्नी की ओर से हाईकोर्ट में यह कहा गया कि यह शिकायत प्रतिशोधवश की गई है, क्योंकि उसने पहले दहेज उत्पीड़न की कार्यवाही शुरू की थी और भरण पोषण का आदेश भी प्राप्त किया था।

हाईकोर्ट ने धारा 405 और 406 आईपीसी के मूल तत्वों पर जोर देते हुए कहा कि आपराधिक विश्वासभंग का अपराध तभी बनता है जब संपत्ति किसी व्यक्ति को सौंपी गई हो और वह उसे बेईमानी से हड़प ले। अदालत ने स्पष्ट कहा कि विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के बाद स्त्री को दी गई संपत्ति उसका स्त्रीधन है, और उस पर उसका पूर्ण अधिकार है। वह संयुक्त वैवाहिक संपत्ति नहीं बन जाती। पति या ससुराल पक्ष का उस पर स्वामित्व या नियंत्रण नहीं होता।

अदालत ने यह भी कहा कि पति कठिन परिस्थिति में पत्नी के स्त्रीधन का उपयोग कर सकता है, लेकिन उस स्थिति में भी उस पर यह नैतिक दायित्व बना रहता है कि वह वही संपत्ति या उसका मूल्य पत्नी को वापस करे। इसका सीधा अर्थ यह है कि स्त्रीधन पर पति का स्वतंत्र स्वामित्व कभी स्थापित नहीं होता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी के खिलाफ धारा 406 आईपीसी का आरोप टिक ही नहीं सकता।

कोर्ट ने आगे यह भी पाया कि धारा 323 और 504 आईपीसी से संबंधित आरोप अत्यंत सामान्य प्रकृति के थे और मजिस्ट्रेट ने बिना विधिक तत्वों की समुचित जांच किए बहुत ही साधारण और लापरवाह तरीके से समन आदेश पारित कर दिया। इसलिए हाईकोर्ट ने समन आदेश दिनांक 17.11.2022 को निरस्त करते हुए Complaint Case No. 8240 of 2018, जो Additional Chief Metropolitan Magistrate-II, Kanpur Nagar के समक्ष लंबित था, उसकी पूरी कार्यवाही समाप्त कर दी।

फैसले का महत्व

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दो बातें साफ करता है। पहली, स्त्रीधन पत्नी की निजी और पूर्ण संपत्ति है। दूसरी, वैवाहिक विवादों में हर संपत्ति विवाद को आपराधिक विश्वासभंग का रूप नहीं दिया जा सकता। यदि शिकायत में धारा 406 आईपीसी के आवश्यक तत्व ही मौजूद नहीं हैं, तो केवल वैवाहिक कटुता के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं होगा।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला स्त्रीधन के संबंध में स्थापित विधिक सिद्धांतों की पुनर्पुष्टि करता है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि पत्नी अपने स्त्रीधन की पूर्ण स्वामिनी है, और उस संपत्ति को लेकर उसके खिलाफ धारा 406 आईपीसी के तहत आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। यह निर्णय न केवल महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि निचली अदालतों को यह भी याद दिलाता है कि समन आदेश पारित करते समय दंडनीय अपराध के आवश्यक तत्वों की सावधानीपूर्वक जांच करना अनिवार्य है।