इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश रेगुलेशन ऑफ अर्बन प्रिमाइसेज टेनेंसी एक्ट, 2021 के तहत बेदखली मांगने वाले मकान मालिक पर यह बोझ नहीं है कि वह अपनी आवश्यकता को पुराने कानून की तरह “bona fide requirement” या “comparative hardship” की कसौटी पर साबित करे। कोर्ट ने कहा कि धारा 21(2)(m) का दायरा अलग है, और इसके तहत यह दिखाना पर्याप्त है कि परिसर मकान मालिक के अपने उपयोग के लिए आवश्यक है। यह फैसला Shyam Pal v. B.S. Enterprises, Matters Under Article 227 No. 3045 of 2026, निर्णय दिनांक 2 अप्रैल 2026 में दिया गया।
मामले के तथ्य यह थे कि किरायेदार ने Rent Authority और Rent Tribunal के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके द्वारा मकान मालिक की release application स्वीकार कर बेदखली का आदेश पारित किया गया था। रिकॉर्ड में यह भी दर्ज था कि मासिक किराया 500 रुपये था और किराया बकाया का प्रश्न निर्णायक आधार नहीं था; बेदखली का आदेश मुख्यतः धारा 21(2)(m) के तहत मकान मालिक की व्यक्तिगत आवश्यकता के आधार पर दिया गया था। बाद में धारा 35 के तहत दायर अपील भी 30 जनवरी 2026 को खारिज कर दी गई, जिसके बाद मामला अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने सबसे पहले धारा 21(2)(m) की भाषा पर जोर दिया। इस प्रावधान के अनुसार, यदि परिसर मकान मालिक को उसके अपने उपयोग के लिए चाहिए, चाहे मौजूदा रूप में या ध्वस्तीकरण और पुनर्निर्माण के बाद, तो Rent Authority बेदखली का आदेश दे सकती है। कोर्ट ने कहा कि इस धारा में कहीं भी “bona fide requirement” या “comparative hardship” जैसे शब्द नहीं हैं। इसके विपरीत, पुराने यू.पी. एक्ट नं. 13 of 1972 में मकान मालिक को न केवल bona fide need सिद्ध करनी पड़ती थी, बल्कि comparative hardship की कसौटी भी पूरी करनी पड़ती थी। कोर्ट के अनुसार, 2021 के अधिनियम में इन शब्दों का हटाया जाना आकस्मिक नहीं, बल्कि एक सचेत विधायी परिवर्तन है।
कोर्ट ने साफ कहा कि जब नई धारा की भाषा अलग है, तब न्यायालय पुराने कानून की कसौटियां वापस इसमें नहीं जोड़ सकता। इसलिए किरायेदार का यह तर्क स्वीकार नहीं किया गया कि मकान मालिक को “वास्तविक”, “गंभीर” या “उच्च स्तर” की जरूरत अलग से सिद्ध करनी चाहिए, या यह दिखाना चाहिए कि उसके पास कोई वैकल्पिक भवन उपलब्ध नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी दलीलें उसी पुराने विधिक ढांचे से जुड़ी थीं जिसमें bona fide need और comparative hardship केंद्रीय तत्व थे। 2021 के अधिनियम के तहत जांच का दायरा सीमित है और वह केवल इस प्रश्न तक सीमित है कि क्या परिसर वास्तव में मकान मालिक के उपयोग के लिए आवश्यक बताया गया है, और क्या किरायेदार ने उस दावे को ठोस सामग्री से खंडित किया है।
निर्णय में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि मकान मालिक बिना किसी pleading या evidence के केवल एक औपचारिक दावा करके बेदखली पा जाएगा। न्यायालय ने कहा कि मकान मालिक को अपनी आवश्यकता plead और demonstrate करनी होगी। लेकिन एक बार यह आवश्यकता स्पष्ट रूप से बताई जाती है, तब किरायेदार पर यह दायित्व आता है कि वह उसका ठोस और विश्वसनीय प्रतिवाद पेश करे। केवल सामान्य, अस्पष्ट या bald denial पर्याप्त नहीं होगा। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि किरायेदार मकान मालिक की आवश्यकता को विश्वसनीय सामग्री से rebut नहीं कर सका, इसलिए निचली प्राधिकरणों के समवर्ती निष्कर्षों में दखल का कोई आधार नहीं था।
हाईकोर्ट ने उन निर्णयों को भी अलग बताया जिन पर किरायेदार ने भरोसा किया था। कोर्ट ने कहा कि Bombay Rent Act या Delhi Rent Control Act जैसे अन्य कानूनों में प्रयुक्त शब्दावली और वैधानिक ढांचा अलग है, जहां “reasonably and bona fide required” या वैकल्पिक आवास जैसी शर्तें विधि में स्वयं निहित हैं। इसलिए उन कानूनों की व्याख्या को सीधे 2021 के उत्तर प्रदेश अधिनियम पर लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उसके अपने हाल के निर्णयों में भी यही दृष्टिकोण लिया गया है कि 2021 के कानून के तहत inquiry सीमित है और पुराने कानून वाली comparative hardship analysis अब लागू नहीं रहती।
अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि Rent Authority और Rent Tribunal दोनों के आदेश 2021 अधिनियम की योजना के अनुरूप हैं और उनमें कोई perversity, illegality या jurisdictional error नहीं है। इसलिए अनुच्छेद 227 की supervisory jurisdiction में हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता। याचिका खारिज कर दी गई। हालांकि, किरायेदार की प्रार्थना पर और मकान मालिक की ओर से आपत्ति न होने पर कोर्ट ने परिसर खाली करने के लिए 8 महीने का समय दिया, अर्थात 2 दिसंबर 2026 तक का अवकाश। इसके साथ शर्त लगाई गई कि किरायेदार दो सप्ताह के भीतर undertaking देगा और विस्तारित अवधि के दौरान प्रति माह 2000 रुपये use and occupation charges जमा करेगा। शर्तों का उल्लंघन होने पर यह संरक्षण स्वतः समाप्त हो जाएगा।
यह निर्णय व्यावहारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह 1972 के पुराने किराया कानून और 2021 के नए टेनेंसी कानून के बीच बुनियादी अंतर को रेखांकित करता है। अब 2021 अधिनियम के मामलों में बहस का केंद्र यह नहीं रहेगा कि मकान मालिक की आवश्यकता कितनी bona fide है या किरायेदार की कठिनाई तुलनात्मक रूप से अधिक है या नहीं। बल्कि मुख्य प्रश्न यह होगा कि क्या मकान मालिक ने अपनी आवश्यकता स्पष्ट रूप से स्थापित की है और क्या किरायेदार उस दावे को ठोस सामग्री से चुनौती दे पाया है। इस प्रकार यह फैसला उत्तर प्रदेश में नए टेनेंसी कानून के तहत मकान मालिक और किरायेदार के बीच होने वाले विवादों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जाएगा।