सुप्रीम कोर्ट ने M/s A.K.G. Construction and Developers Pvt. Ltd. v. State of Jharkhand & Ors., Civil Appeal Nos. of 2026 arising out of SLP (C) No. 23858 of 2025 with SLP (C) No. 22669 of 2025, निर्णय दिनांक 02 अप्रैल 2026 में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किया है कि किसी ठेके की termination और contractor की blacklisting एक ही बात नहीं हैं। अदालत ने कहा कि ठेका समाप्त करना और भविष्य के सरकारी कार्यों से किसी ठेकेदार को बाहर कर देना, दोनों की प्रकृति, प्रभाव और कानूनी कसौटियाँ अलग हैं। इसलिए केवल termination के आधार पर blacklisting को उसका “logical consequence” मानकर लागू नहीं किया जा सकता।

इस मामले में appellant कंपनी को झारखंड के Drinking Water and Sanitation Department ने एक Elevated Service Reservoir के निर्माण का कार्य दिया था। कार्य के दौरान 01 जून 2024 को जलाशय का top dome गिर गया। विभाग ने 04 जून 2024 को स्पष्टीकरण माँगा, बाद में विभिन्न तकनीकी जाँचें कराईं, और अंततः 23 अगस्त 2024 को एक संयुक्त आदेश पारित कर contract terminate कर दिया तथा contractor को 5 वर्षों के लिए blacklist भी कर दिया। विभाग का आरोप था कि निर्माण कार्य approved design and drawing के अनुसार नहीं हुआ और quality में गंभीर कमी थी।

ठेकेदार ने इस कार्रवाई को चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने विभाग के आदेश को सही ठहराया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सुप्रीम Court ने रिकॉर्ड देखकर यह माना कि material ऐसा था जिससे negligence और खराब गुणवत्ता के आधार पर termination order को सही ठहराया जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि termination के प्रश्न पर contractor को पर्याप्त अवसर मिला था और इस हिस्से में दखल देने का कोई कारण नहीं बनता। इसलिए contract termination को बरकरार रखा गया।

लेकिन अदालत ने blacklisting के प्रश्न पर अलग दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने कहा कि झारखंड के Contractor Registration Rules, 2012 में blacklisting के लिए अलग प्रावधान है, और Rule 10.5 के तहत blacklisting से पहले show cause notice देना आवश्यक है। इतना ही नहीं, notice ऐसा होना चाहिए जिससे साफ-साफ पता चले कि विभाग contractor को blacklist करने का विचार कर रहा है और उसे इस प्रस्तावित दंड के विरुद्ध उत्तर देने का वास्तविक अवसर दिया जा रहा है। अदालत ने माना कि 04.06.2024 का notice इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, क्योंकि उसमें blacklisting को स्पष्ट, विशिष्ट और स्वतंत्र प्रस्ताव के रूप में सामने नहीं रखा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि termination और blacklisting को conflated नहीं किया जा सकता। termination का संबंध मौजूदा contract और उसके performance से है, जबकि blacklisting का असर contractor के भविष्य के सरकारी व्यवसाय पर पड़ता है। blacklisting stigmatic भी है और exclusionary भी। इसका परिणाम यह होता है कि contractor न केवल वर्तमान काम खो सकता है, बल्कि आने वाले वर्षों तक सरकारी ठेकों से बाहर हो सकता है। इसलिए blacklisting के लिए अधिक सावधानी, स्पष्ट application of mind और natural justice के सिद्धांतों का कठोर पालन जरूरी है।

अदालत ने यह भी कहा कि blacklisting कोई automatic या mechanical action नहीं हो सकती। केवल इसलिए कि department ने contract terminate कर दिया, यह नहीं माना जा सकता कि blacklisting अपने-आप उचित हो गई। विभाग को पहले स्वतंत्र रूप से यह तय करना होगा कि क्या contractor का आचरण ऐसा है जो उसे भविष्य के सरकारी कार्यों से बाहर करने को न्यायोचित बनाता है। उसके बाद ही स्पष्ट notice देकर कारण बताओ प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। इस मामले में न तो notice पर्याप्त था और न final blacklisting order में यह बताया गया था कि 5 साल की blacklisting आखिर क्यों आवश्यक थी।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि blacklisting order illegal, arbitrary और unreasonable है। हालांकि सामान्य स्थिति में अदालत विभाग को fresh show cause notice जारी करने की छूट दे सकती थी, लेकिन यहाँ आदेश को पारित हुए काफी समय बीत चुका था। इसलिए न्यायालय ने relief mould करते हुए यह निर्देश दिया कि blacklisting अब तत्काल प्रभाव से समाप्त मानी जाएगी। यानी termination बरकरार रही, लेकिन blacklisting हटा दी गई।

यह निर्णय सरकारी ठेकों, विभागीय अनुशासन और प्रशासनिक न्याय के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका सीधा संदेश यह है कि राज्य के पास blacklisting की शक्ति अवश्य है, पर उसका प्रयोग विवेकपूर्ण, कारणयुक्त और natural justice के अनुरूप ही होना चाहिए। यदि notice में proposed penalty साफ न हो, यदि contractor को meaningful opportunity न मिले, या यदि authority blacklisting के लिए स्वतंत्र कारण दर्ज न करे, तो ऐसी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकेगी।

प्रमुख निष्कर्ष

पहला, contract termination और blacklisting दो अलग-अलग विधिक कार्रवाइयाँ हैं।
दूसरा, blacklisting के लिए specific और unambiguous show cause notice आवश्यक है।
तीसरा, blacklisting को termination का automatic consequence नहीं माना जा सकता।
चौथा, blacklisting order में independent application of mind और reasons होने चाहिए।
पाँचवाँ, यदि प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध हो, तो even when termination survives, blacklisting set aside की जा सकती है।