सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सेवा-विधि निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी उच्च पदस्थ अधिकारी को केवल इस आधार पर अपने अधीनस्थ सह-दोषियों के समान हल्की सजा का दावा करने का अधिकार नहीं है कि उन सब पर आरोप एक ही घटना से जुड़े थे। न्यायालय ने कहा कि “Authority carries accountability; higher the authority, higher the accountability.” अर्थात जितना ऊँचा पद, उतनी अधिक जवाबदेही। इसी सिद्धांत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एंड सिंड बैंक के एक सीनियर मैनेजर की बर्खास्तगी बहाल कर दी।

यह मामला Punjab & Sind Bank v. Sh. Raj Kumar, Civil Appeal No. 847 of 2026 से संबंधित है, जिसमें 2 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाया। बैंक के अनुसार, प्रतिवादी अधिकारी ने दो अन्य सहकर्मियों, एक अधिकारी और एक गनमैन, के साथ मिलकर ग्राहकों की धनराशि के दुरुपयोग, बैंक अभिलेखों से छेड़छाड़ और व्यक्तिगत लाभ हेतु अनियमितताओं में भूमिका निभाई थी। विभागीय कार्यवाही के बाद प्रतिवादी, जो उस समय Senior Manager in MMGS-III Scale पद पर था, को dismissal from service की सजा दी गई, जबकि सह-दोषियों को अपेक्षाकृत हल्की सजा मिली।

प्रतिवादी ने हाईकोर्ट में यह तर्क लिया कि जब उसी घटना में शामिल अन्य कर्मचारियों को कम दंड दिया गया, तो उसे सेवा से बर्खास्त करना Article 14 के विरुद्ध भेदभावपूर्ण है। दिल्ली हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने यह दलील स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी को compulsory retirement में बदल दिया था। डिवीजन बेंच ने भी उस निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों आदेशों को गलत ठहराया और कहा कि हाईकोर्ट ने parity के सिद्धांत को गलत तरीके से लागू किया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि प्रतिवादी की तुलना उसके अधीनस्थ अधिकारी और गनमैन से करना ही तर्क-विरुद्ध है। न्यायालय के अनुसार, शाखा प्रबंधक या वरिष्ठ प्रबंधक का पद केवल नाम का पद नहीं होता, बल्कि उसके साथ उच्च स्तर की निष्ठा, नियंत्रण, पर्यवेक्षण और संस्थागत भरोसा जुड़ा होता है। इसलिए यदि उसी घटनाक्रम में एक वरिष्ठ अधिकारी और उसके अधीनस्थ शामिल हों, तो दंड निर्धारण में पद और जिम्मेदारी का अंतर एक वैध और महत्वपूर्ण कारक है। कोर्ट ने साफ कहा कि उच्च पद पर बैठे अधिकारी को हल्की सजा का दावा “parity” के नाम पर नहीं मिल सकता।

न्यायालय ने सेवा-विधि के स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि विभागीय दंड के मामले में न्यायिक समीक्षा बहुत सीमित होती है। अदालतें सामान्यतः दंड के प्रश्न पर अपनी राय नहीं थोपतीं। केवल तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है जब दंड इतना असंगत हो कि वह न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर दे, या वह स्पष्ट रूप से irrational, perverse या outrageous defiance of logic हो। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी पर कठोर दंड लगाना न तो irrational था और न ही shockingly disproportionate। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा दंड में संशोधन करना विधिसम्मत नहीं था।

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जहां सुप्रीम Court ने कहा कि “equating a branch manager of a bank with its gunman seems to us to be in outrageous defiance of logic and reason.” यह टिप्पणी बताती है कि समानता का सिद्धांत यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। यदि पद, अधिकार, जिम्मेदारी और संस्था द्वारा रखे गए विश्वास का स्तर अलग-अलग है, तो दंड भी अलग हो सकता है।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच और सिंगल जज, दोनों के आदेश रद्द कर दिए और बैंक के अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा प्रतिवादी पर लगाई गई बर्खास्तगी की सजा बहाल कर दी। साथ ही यह भी कहा कि पक्षकार अपने-अपने खर्च स्वयं वहन करेंगे।

इस फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय सेवा-विधि और विभागीय अनुशासन के मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर है। इससे यह सिद्धांत मजबूत होता है कि:

  1. समान घटना में शामिल होने भर से सभी कर्मचारियों को समान दंड मिलना आवश्यक नहीं है।
  2. वरिष्ठ अधिकारी की जवाबदेही अधीनस्थ से अधिक होती है।
  3. Judicial review का दायरा सीमित है; अदालतें सामान्यतः दंड का पुनर्निर्धारण नहीं करेंगी।
  4. Parity का सिद्धांत तभी लागू होगा जब भूमिका, पद, जिम्मेदारी और दोष की प्रकृति वास्तव में समान हो।