मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वत मामले में दोषसिद्ध किया जा चुका है, तो उसी आचरण के आधार पर सेवा से बर्खास्तगी से पहले अलग से विस्तृत विभागीय जांच कराना आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे में कर्मचारी को अपना बचाव करने का पर्याप्त अवसर पहले ही मिल चुका होता है।
यह फैसला Ratnawali Vanshwati v. State of Madhya Pradesh, Writ Petition No. 20253 of 2022, में 16 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति विशाल धगत ने दिया।
मामले में याचिकाकर्ता लोकायुक्त ट्रैप के बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराओं के तहत दोषसिद्ध हुई थीं। इसके बाद 21 जून 2021 के आदेश से उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। याचिका में यह तर्क दिया गया कि बिना सुनवाई का अवसर दिए और बिना विभागीय जांच के बर्खास्तगी नहीं की जा सकती, तथा दोषसिद्धि के विरुद्ध आपराधिक अपील लंबित होने से कार्यवाही अंतिम नहीं मानी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के Rule 19 में विशेष प्रक्रिया दी गई है, जो ऐसे मामलों में लागू होती है जहाँ कर्मचारी किसी आपराधिक आरोप में अपने आचरण के कारण दोषसिद्ध हो चुका हो। कोर्ट ने Union of India v. Tulsiram Patel पर भरोसा करते हुए दोहराया कि दोषसिद्धि के बाद नई विभागीय जांच आवश्यक नहीं है; हाँ, दंड प्राधिकारी को मामले के तथ्यों और अपराध की गंभीरता पर विचार कर कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।
कोर्ट ने पाया कि दंड प्राधिकारी ने दोषसिद्धि, अपराध की प्रकृति और इसे moral turpitude का मामला मानते हुए आदेश पारित किया था। इसलिए कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और बर्खास्तगी आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को इतना नहीं बढ़ाया जा सकता कि वह जनहित, प्रशासनिक शुचिता और भ्रष्ट लोकसेवकों को सेवा से अलग करने की प्रक्रिया में बाधा बन जाए।