पटना हाईकोर्ट ने Anil Kumar Jha v. The State of Bihar and Anr., Criminal Miscellaneous No. 23310 of 2016 में 23 मार्च 2026 को पारित निर्णय में महत्वपूर्ण रूप से कहा कि यदि किसी लोक सेवक के विरुद्ध उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े कृत्य के संबंध में section 197 CrPC के तहत आवश्यक पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई है, तो ऐसी आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ से ही विधि-विरुद्ध मानी जाएगी। यह फैसला न्यायमूर्ति Jitendra Kumar की एकलपीठ ने दिया।

मामला वन विभाग के एक रेंज अधिकारी अनिल कुमार झा से जुड़ा था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि ट्रैक्टर रोककर मारपीट की गई, ₹25,000 की मांग की गई और मोबाइल फोन छीन लिया गया। निचली अदालत ने शिकायत मामले में संज्ञान लेकर समन जारी कर दिया था। बाद में अधिकारी ने हाईकोर्ट में section 482 CrPC के तहत याचिका दाखिल कर कहा कि कथित घटना उनके आधिकारिक दायित्वों के निर्वहन के दौरान हुई थी, इसलिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना उनके खिलाफ संज्ञान लिया ही नहीं जा सकता था।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि section 197 CrPC का उद्देश्य लोक सेवकों को झूठे, दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधपूर्ण अभियोजनों से बचाना है, ताकि वे बिना भय के अपने सरकारी दायित्व निभा सकें। अदालत ने यह भी दोहराया कि संरक्षण हर सरकारी कर्मचारी को हर स्थिति में नहीं मिलता, बल्कि वहीँ मिलता है जहां आरोपित कृत्य और आधिकारिक दायित्व के बीच युक्तिसंगत संबंध हो। इस मामले में अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता वन विभाग में रेंज अधिकारी थे और शिकायत में वर्णित घटना उनके आधिकारिक कार्य से जुड़ी हुई थी।

न्यायालय ने विशेष रूप से कहा कि जहां पूर्व स्वीकृति आवश्यक हो, वहां उसके बिना चलाया गया मुकदमा अधिकार-क्षेत्र के अभाव में शून्य माना जाएगा। आदेश में दर्ज है कि section 73 of the Indian Forest Act, 1927 के अनुसार वन अधिकारी लोक सेवक माने जाते हैं, और section 197 CrPC के तहत ऐसे लोक सेवक के विरुद्ध, यदि आरोप आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से संबंधित हों, तो बिना पूर्व स्वीकृति संज्ञान नहीं लिया जा सकता। चूंकि इस मामले में न तो शिकायतकर्ता ने कोई स्वीकृति प्राप्त की थी और न ही सक्षम प्राधिकारी द्वारा कोई स्वीकृति दी गई थी, इसलिए संज्ञान आदेश और समन आदेश दोनों विधिसम्मत नहीं पाए गए।

अदालत ने यह पहलू भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता के विरुद्ध अवैध खनन को लेकर दो दिन पहले ही कार्यवाही शुरू की थी। इसी पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने माना कि बाद की शिकायत में दुर्भावना और प्रतिशोध का तत्व भी परिलक्षित होता है। अदालत ने State of Haryana v. Bhajan Lal के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि यदि आपराधिक कार्यवाही दुर्भावना से प्रेरित हो और प्रतिशोध के लिए शुरू की गई हो, तो हाईकोर्ट section 482 CrPC के तहत उसे रद्द कर सकता है।

अंततः पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा पारित 29 मई 2008 के संज्ञान आदेश, 23 अगस्त 2014 के समन आदेश तथा उनसे उत्पन्न पूरी आपराधिक कार्यवाही को याचिकाकर्ता के विरुद्ध रद्द कर दिया। यह फैसला लोक सेवकों के अभियोजन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि official duty से युक्तिसंगत रूप से जुड़े कृत्य पर बिना वैधानिक स्वीकृति के आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायसंगत नहीं है।