इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Smt. Humaira Riyaz vs. State of U.P. and Another, Criminal Revision No. 3305 of 2025 में 10 मार्च 2026 को पारित निर्णय में कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत यदि तलाक विधि के अनुसार दिया गया है, तो वह उसी तारीख से प्रभावी माना जाएगा जिस तारीख को उसका उच्चारण किया गया था। न्यायमूर्ति Madan Pal Singh की पीठ ने कहा कि बाद में पारित न्यायालयीय डिक्री केवल घोषणात्मक होती है और वह कोई नई वैवाहिक स्थिति उत्पन्न नहीं करती।
मामले में पत्नी ने प्रयागराज के परिवार न्यायालय के 27 मई 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। परिवार न्यायालय ने पत्नी का भरण-पोषण दावा अस्वीकार कर दिया था, जबकि उसके दो नाबालिग पुत्रों के पक्ष में भरण-पोषण मंजूर किया गया था। पत्नी का कहना था कि उसका पहला निकाह 3 फरवरी 2002 को हुआ था और उसके प्रथम पति ने 27 फरवरी 2005 को तलाक दे दिया था। बाद में फैमिली कोर्ट ने 8 जनवरी 2013 को उस तलाक को वैध घोषित किया। पत्नी ने यह भी कहा कि इद्दत अवधि के बाद उसने 27 मई 2012 को दूसरा निकाह किया था।
परिवार न्यायालय ने यह मानते हुए पत्नी का दावा खारिज कर दिया कि चूंकि तलाक की वैधता की न्यायिक घोषणा 8 जनवरी 2013 को हुई, इसलिए 27 मई 2012 को किया गया दूसरा निकाह वैध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को त्रुटिपूर्ण ठहराया।
अदालत ने कहा कि तलाक से संबंधित ऐसी डिक्री केवल यह घोषित करती है कि तलाक पहले ही हो चुका था। वह तलाक की प्रभावी तिथि को बदलती नहीं है। इसलिए केवल इस आधार पर कि डिक्री बाद में आई, यह नहीं कहा जा सकता कि उससे पहले किया गया दूसरा निकाह स्वतः अवैध था।
हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां तलाक की वैधता स्वयं विवादित हो, वहां न्यायालय को साक्ष्यों के आधार पर यह जांच करनी होगी कि तलाक वास्तव में मुस्लिम कानून के अनुसार दिया गया था या नहीं। लेकिन वर्तमान मामले में परिवार न्यायालय ने मूल विधिक सिद्धांत को ही गलत समझ लिया था।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के 27 मई 2025 के आदेश को उस सीमा तक निरस्त कर दिया, जहां तक पत्नी के भरण-पोषण दावे को अस्वीकार किया गया था। मामला पुनः परिवार न्यायालय, प्रयागराज को भेजा गया है ताकि वह पत्नी के दावे पर नए सिरे से विधि के अनुसार निर्णय करे। हाईकोर्ट ने यह भी अपेक्षा की कि मामले का निस्तारण अधिमानतः छह माह के भीतर किया जाए।
यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह विधिक स्थिति स्पष्ट होती है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक की प्रभावशीलता को केवल बाद की न्यायिक डिक्री से नहीं जोड़ा जा सकता।