कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि वैवाहिक विवाद के नाम पर आपराधिक कानून का इस्तेमाल पति के पूरे परिवार को मुकदमे में घसीटने के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति M. नागप्रसन्ना ने कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, खासकर तब जब आरोप सास, ससुर या अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ सामान्य और बिना ठोस विवरण के लगाए गए हों।

यह फैसला Smt. Sumithra & Ors. v. State of Karnataka & Anr., Criminal Petition No. 12989 of 2024 में 25 मार्च 2026 को दिया गया। याचिका सास, ससुर और ननद यानी आरोपी संख्या 2 से 4 की ओर से दायर की गई थी, जिन्होंने C.C. No. 23089 of 2021 में लंबित आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। मामला Crime No. 333 of 2018 से जुड़ा था, जिसमें IPC की धारा 498A, 506 सहपठित धारा 34 तथा Dowry Prohibition Act की धाराएं 3 और 4 लगाई गई थीं।

अदालत ने शिकायत का परीक्षण करते हुए पाया कि उसमें लगाए गए आरोप मुख्यतः सामान्य, व्यापक और अस्पष्ट थे। आदेश में कहा गया कि संयुक्त परिवारों में होने वाली साधारण घरेलू अनबन और छोटी-मोटी कहासुनी को “अपराध” का रूप दे दिया गया है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कथित दहेज मांग का विवरण मुख्यतः दिसंबर 2017 से फरवरी 2018 के बीच विवाह-पूर्व चर्चाओं और शादी के खर्चों के संदर्भ में था, न कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किसी स्पष्ट और ठोस अवैध दहेज मांग के रूप में।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि धारा 498A का उद्देश्य वास्तविक क्रूरता के मामलों से निपटना है। केवल सामान्य आरोप, बिना किसी विशिष्ट तिथि, समय, घटना या overt act के, आपराधिक अभियोजन को जारी रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने यह भी दोहराया कि केवल वैवाहिक तनाव या रिश्तों में खटास अपने-आप में “क्रूरता” नहीं बन जाती।

इन्हीं कारणों से कोर्ट ने माना कि सास, ससुर और ननद के खिलाफ मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने C.C. No. 23089 of 2021 की पूरी कार्यवाही को आरोपी संख्या 2 से 4 के संबंध में रद्द कर दिया।