इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Murtaza Alias Phool Miya Alias Guddu v. State of U.P. and Another, Criminal Revision No. 5870 of 2025, निर्णय दिनांक 18 March 2026 में महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि धारा 125 Cr.P.C. के तहत भरण-पोषण का अधिकार कोई एकबारगी राहत नहीं, बल्कि पति का निरंतर वैधानिक दायित्व है। यदि समझौते के बाद पति-पत्नी फिर साथ रहे हों, लेकिन बाद में पति ने पत्नी को प्रताड़ित कर अलग रहने पर मजबूर कर दिया, तो पत्नी को नई maintenance application दाखिल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि पत्नी पहले से लंबित कार्यवाही को आगे बढ़ा सकती है। साथ ही, पति की आय के ठोस दस्तावेज न होने पर भी उसे सक्षम शरीर वाला मानते हुए पत्नी के भरण-पोषण से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा आदेश की तारीख के बाद तय ₹9,000 प्रति माह maintenance को घटाकर ₹5,250 प्रति माह कर दिया, जबकि आवेदन की तारीख से आदेश तक का ₹4,500 प्रति माह maintenance बरकरार रखा।
यह फैसला साफ करता है कि maintenance का दावा समझौते से स्वतः समाप्त नहीं होता, और पत्नी को हर नए विवाद पर शून्य से नई कार्यवाही शुरू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।