विभागीय कार्यवाही में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि कर्मचारी ने आरोपों से स्पष्ट इनकार किया है, तो केवल कागजी औपचारिकता निभाकर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। Supreme Court ने Jai Prakash Saini v. Managing Director, U.P. Cooperative Federation Ltd. & Ors., SLP (Civil) No. 2900/2020 में 1 April 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि जब आरोप नकारे गए हों, तब मौखिक जांच, साक्ष्य प्रस्तुत करना और गवाहों को जिरह के लिए उपलब्ध कराना प्राकृतिक न्याय का अनिवार्य हिस्सा है। इन बुनियादी चरणों को छोड़े बिना ही कर्मचारी को बर्खास्त करना और वसूली का आदेश देना कानूनन टिकाऊ नहीं है।  यदि कर्मचारी ने आरोपों से इनकार किया है, तो बिना मौखिक जांच, बिना गवाहों के परीक्षण और बिना जिरह का अवसर दिए पारित बर्खास्तगी एवं वसूली आदेश कानून में टिक नहीं सकते।

मामले के तथ्य

अपीलकर्ता जय प्रकाश सैनी, U.P. Cooperative Federation Ltd. में कार्यरत थे और उस समय धान क्रय केंद्र के प्रभारी थे। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने किसानों से खरीदे गए धान में भारी कमी की, तथा एक पूरक आरोपपत्र में उन पर धन के गबन का भी आरोप लगाया गया। विभागीय जांच में आरोप सिद्ध मान लिए गए, जिसके बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और लगभग ₹9.53 लाख की वसूली का आदेश भी पारित किया गया। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ बेंच ने भी उनकी चुनौती खारिज कर दी।

अपीलकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि न तो कोई वास्तविक मौखिक जांच हुई, न किसी गवाह का परीक्षण हुआ, न ही आरोपों को सिद्ध करने के लिए विभाग ने साक्ष्य विधिवत प्रस्तुत किए। उनका कहना था कि यह पूरी कार्यवाही सेवा नियमों और प्राकृतिक न्याय, दोनों के विरुद्ध थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या देखा

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य नोट किया—प्रतिवादी पक्ष ने अपनी लिखित दलीलों में यह स्वीकार किया कि जांच के दौरान कोई भी गवाह पेश नहीं किया गया था। विभाग की ओर से यह तर्क दिया गया कि कर्मचारी का जवाब “evasive” था, इसलिए उसे आरोपों की स्वीकृति माना जा सकता है और गवाहों की जरूरत नहीं थी। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को सिरे से अस्वीकार कर दिया।

न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि विभागीय आरोपपत्र कोई दीवानी वाद का plaint नहीं है, जहाँ अस्पष्ट उत्तर को admission मान लिया जाए। विभागीय जांच में सिद्धांत सीधा है: जब तक कर्मचारी स्पष्ट और साफ शब्दों में अपना दोष स्वीकार न करे, तब तक आरोप सिद्ध करने का भार नियोक्ता या विभाग पर ही रहेगा।

मौखिक जांच क्यों जरूरी है

सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में Chamoli District Co-operative Bank Ltd. v. Raghunath Singh Rana, Sur Enamel and Stamping Works Ltd. v. Workmen तथा State of Uttaranchal v. Kharak Singh जैसे पूर्व निर्णयों पर भरोसा किया। कोर्ट ने दोहराया कि यदि आरोप नकारे गए हों, तो विभाग को पहले अपना साक्ष्य पेश करना होगा, गवाहों को जांच में बुलाना होगा, और कर्मचारी को जिरह का अवसर देना होगा। उसके बाद ही कर्मचारी से पूछा जा सकता है कि वह अपने बचाव में क्या साक्ष्य देना चाहता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि मामला केवल दस्तावेजों पर आधारित हो, तब भी, जब तक कर्मचारी उन दस्तावेजों को स्वीकार न कर ले, विभाग को किसी गवाह के माध्यम से उन दस्तावेजों को सिद्ध करना होगा। केवल फाइल देखकर या कागजों के आधार पर एकतरफा निष्कर्ष निकाल देना वैध जांच नहीं मानी जा सकती।

हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से असहमति

हाईकोर्ट ने यह माना था कि कर्मचारी ने अलग से किसी गवाह को बुलाने या किसी व्यक्ति से जिरह करने का अनुरोध नहीं किया, इसलिए जांच में कोई कमी नहीं थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब आरोपों का औपचारिक रूप से खंडन किया गया है, तब विभाग का यह दायित्व बनता है कि वह पहले अपने आरोपों को विधिसम्मत तरीके से सिद्ध करे। यह नहीं कहा जा सकता कि कर्मचारी के अलग से आग्रह न करने के कारण विभाग साक्ष्य पेश करने की जिम्मेदारी से मुक्त हो गया।

अंतिम फैसला

सुप्रीम Court ने माना कि चूँकि विभाग ने कोई गवाह पेश नहीं किया, जबकि आरोपों से इनकार किया गया था, इसलिए पूरी विभागीय जांच ही दोषपूर्ण और विधि-विरुद्ध हो गई। परिणामस्वरूप, बर्खास्तगी और वसूली, दोनों आदेश रद्द कर दिए गए। साथ ही, कोर्ट ने Federation को यह स्वतंत्रता दी कि यदि वह चाहे तो छह महीने के भीतर de novo enquiry कर सकती है। यदि छह महीने के भीतर नई जांच नहीं की जाती, तो कर्मचारी को सेवा में पुनर्स्थापना, सेवा की निरंतरता और बकाया वेतन के लाभ मिलेंगे, समायोजन केवल निलंबन भत्ते का होगा। यदि नई जांच की जाती है, तो पहले कर्मचारी को बहाल करके निलंबित रखा जा सकता है और नियमों के अनुसार निलंबन भत्ता दिया जाएगा।

इस फैसले का व्यापक महत्व

यह निर्णय केवल सहकारी संस्थाओं के कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। इसका सिद्धांत हर उस विभागीय कार्यवाही पर लागू होता है जहाँ सेवा नियम प्राकृतिक न्याय के पालन की अपेक्षा करते हैं। यह फैसला बताता है कि:

विभागीय जांच कोई औपचारिक खानापूरी नहीं है।
आरोपपत्र जारी करना और जवाब ले लेना पर्याप्त नहीं है।
यदि कर्मचारी आरोपों से इनकार करता है, तो विभाग को उन्हें साबित भी करना होगा।
गवाह, जिरह और सुनवाई, न्यायसंगत जांच की आत्मा हैं।

इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया कि “oral inquiry” का अर्थ केवल कर्मचारी को सुन लेना नहीं है, बल्कि आरोप सिद्ध करने की वास्तविक, विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाना है। बिना उसके, कठोर दंड जैसे बर्खास्तगी और वसूली टिक नहीं सकती।

निष्कर्ष

Jai Prakash Saini का यह निर्णय सेवा कानून में एक महत्वपूर्ण पुनर्पुष्टि है कि प्राकृतिक न्याय केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि विभागीय दंड प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त है। यदि आरोप नकारे गए हैं, तो विभाग को साक्ष्य के साथ आगे आना ही होगा। अन्यथा, पूरी कार्यवाही न्यायिक समीक्षा में गिर सकती है।

यह फैसला उन सभी मामलों में बेहद उपयोगी है जहाँ विभागीय प्राधिकारी बिना गवाहों की जांच, बिना जिरह और बिना वास्तविक मौखिक जांच के दंडादेश पारित कर देते हैं।

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