इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ खंडपीठ ने Gaya Prasad Yadav v. State of U.P. through Principal Secretary, Home, Lucknow and Another, Special Appeal No. 408 of 2021 में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही उसकी सेवानिवृत्ति से पहले शुरू हो चुकी हो, तो वह कार्यवाही जारी रह सकती है, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद उसे “dismiss” नहीं किया जा सकता, जब तक कि ऐसा करने वाली कोई विशेष वैधानिक व्यवस्था मौजूद न हो। यह निर्णय न्यायमूर्ति Devendra Kumar Upadhyaya और न्यायमूर्ति Shree Prakash Singh की खंडपीठ ने 23.09.2022 को दिया। याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री Amit Bose ने, सहायक अधिवक्ता श्री Mohd. Shujauddin Waris के साथ, पैरवी की।

मामले के तथ्य

मामले में याची उत्तर प्रदेश पुलिस में आरक्षी था। उस पर कथित रूप से जाली शैक्षिक प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी प्राप्त करने का आरोप लगाया गया था। पहले उसे 20.06.2009 को बर्खास्त किया गया। बाद में वह आदेश हाईकोर्ट द्वारा निरस्त हुआ और उसे बहाल किया गया। इसके बाद 04.07.2014 को पुनः बर्खास्तगी का आदेश पारित हुआ। वह आदेश भी 13.03.2018 को इसलिए रद्द कर दिया गया क्योंकि शो-कॉज नोटिस और उसके उत्तर पर उचित विचार नहीं किया गया था। इस बीच कर्मचारी 31.05.2015 को सेवानिवृत्त हो चुका था। इसके बावजूद 01.11.2018 को पुलिस अधीक्षक, अम्बेडकर नगर ने फिर से dismissal order पारित कर दिया। यही आदेश अंततः विशेष अपील में चुनौती का विषय बना।

हाईकोर्ट के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न

खंडपीठ के सामने मूल प्रश्न यह था कि क्या Article 351-A of the Civil Service Regulations के होते हुए, सेवानिवृत्त कर्मचारी के विरुद्ध dismissal जैसी सजा दी जा सकती है, या सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय कार्रवाई केवल पेंशन रोकने, घटाने या पेंशन से recovery तक सीमित रहती है। अदालत ने यह भी देखा कि क्या पुलिस अधीक्षक, सेवानिवृत्ति के बाद, retrospective effect से dismissal order पारित कर सकता था।

Article 351-A पर अदालत की स्पष्ट व्याख्या

हाईकोर्ट ने Article 351-A CSR के शुरुआती शब्दों, अर्थात “The Governor reserves to himself the right”, को अत्यंत महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद यदि किसी कर्मचारी के विरुद्ध grave misconduct या pecuniary loss का प्रश्न उठता है, तो पेंशन रोकने, घटाने या उससे recovery का अधिकार केवल Governor को सुरक्षित है। कोई अन्य disciplinary authority या appointing authority यह शक्ति प्रयोग नहीं कर सकती।

साथ ही, कोर्ट ने यह भी माना कि यदि विभागीय कार्यवाही कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने से पहले ही शुरू हो चुकी थी, तो उसकी continuance के लिए अलग से Governor की sanction जरूरी नहीं होती। इस सीमा तक अदालत ने State of U.P. v. Harihar Bholenath के सिद्धांत को स्वीकार किया। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सेवानिवृत्ति के बाद dismissal जैसी substantive penalty दी जा सकती है।

Rabindranath Choubey क्यों लागू नहीं हुआ

राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट के Chairman-cum-Managing Director, Mahanadi Coalfields Ltd. v. Rabindranath Choubey निर्णय के अनुसार, यदि विभागीय कार्यवाही सेवा काल में शुरू हुई हो, तो सेवानिवृत्ति के बाद भी dismissal जैसी सजा दी जा सकती है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि Rabindranath Choubey का निर्णय एक विशेष सेवा-नियम पर आधारित था, जिसमें स्पष्ट प्रावधान था कि यदि विभागीय कार्यवाही सेवा में रहते शुरू हुई हो, तो सेवानिवृत्ति के बाद भी कर्मचारी को इस उद्देश्य से सेवा में माना जाएगा और कार्यवाही उसी प्रकार निष्कर्ष तक पहुंचेगी जैसे वह सेवा में ही हो।

हाईकोर्ट ने पाया कि U.P. Police Officers of the Subordinate Ranks (Punishment and Appeal) Rules, 1991 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। न ही CSR में ऐसा कोई नियम है, जो सेवानिवृत्ति के बाद dismissal की अनुमति देता हो। इसलिए Rabindranath Choubey का ratio इस मामले में लागू नहीं होता। उलटे, अदालत ने यह रेखांकित किया कि Prabhakar Sadashiv Karvade के अनुसार सेवानिवृत्ति के बाद dismissal या removal जैसी सजा तभी संभव है, जब कोई specific rule ऐसा expressly permit करता हो।

हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष

अदालत ने साफ कहा कि 31.05.2015 को सेवानिवृत्ति के साथ employer-employee relationship समाप्त हो चुका था। इसलिए 01.11.2018 को पुलिस अधीक्षक द्वारा dismissal order दोहराना कानूनन टिकाऊ नहीं था। खंडपीठ ने 11.08.2021 का एकलपीठ आदेश और 01.11.2018 का पुलिस अधीक्षक का आदेश दोनों निरस्त कर दिए। हालांकि, राज्य को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह चाहे तो Article 351-A CSR के तहत विधिसम्मत कार्रवाई कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में SLP का क्या हुआ

राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई। मामला SLP (Civil) Diary No. 33809/2023, State of U.P. & Another v. Gaya Prasad Yadav (D) के रूप में आया। 17.02.2025 को सुप्रीम Court की पीठ, जिसमें Justice Pamidighantam Sri Narasimha और Justice Manoj Misra शामिल थे, ने delay condone करने के बाद कहा कि वह हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने के लिए inclined नहीं है। साथ ही Court ने यह भी कहा कि question of law is kept open. इसके बाद Special Leave Petition dismiss कर दी गई।

इस फैसले का महत्व

यह निर्णय सेवा कानून में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत को पुनः पुष्ट करता है:
सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय कार्यवाही जारी रह सकती है, पर उसकी परिणति dismissal में नहीं हो सकती, जब तक कोई स्पष्ट नियम इसकी अनुमति न देता हो। उत्तर प्रदेश में, जहां Article 351-A CSR लागू होता है, सेवानिवृत्त कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई का दायरा सामान्यतः पेंशन से संबंधित परिणामों तक सीमित रहता है, और वह शक्ति भी Governor के पास सुरक्षित है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा SLP dismiss कर दिए जाने के बाद यह और अधिक स्पष्ट हो गया है कि कम-से-कम इस मामले के तथ्यों में हाईकोर्ट का दृष्टिकोण बरकरार है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने “question of law” खुला रखा है, इसलिए भविष्य में किसी उपयुक्त मामले में इस प्रश्न पर और व्यापक निर्णय आ सकता है।

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