इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Sadanand Sharma v. State of U.P. and 6 Others, Writ – A No. 14712 of 2024 में एक महत्वपूर्ण अंतरिम राहत देते हुए यह संकेत दिया कि सेवानिवृत्ति के बाद CSR 351 और 351-A के तहत विभागीय कार्यवाही शुरू करना कोई साधारण प्रशासनिक कदम नहीं है। यदि ऐसी कार्यवाही सक्षम प्राधिकारी की विधिसम्मत स्वीकृति के बिना शुरू की जाती है, तो उस पर न्यायिक हस्तक्षेप हो सकता है। इस मामले में याची की ओर से अधिवक्ता देवांश मिश्र उपस्थित हुए, जबकि प्रतिवादियों की ओर से अशोक कुमार पांडेय और C.S.C. ने पक्ष रखा।
मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि 15.07.2024 के आदेश द्वारा याची के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई, जबकि याची पहले ही 30.06.2024 को सेवानिवृत्त हो चुके थे। याची का स्पष्ट तर्क था कि सेवानिवृत्ति के बाद ऐसी कार्यवाही शुरू करने के लिए आवश्यक स्वीकृति विधि के अनुसार होनी चाहिए, और बिना वैध अनुमोदन के यह कार्रवाई नहीं चल सकती। 21.09.2024 को जब मामला पहली बार कोर्ट के समक्ष आया, तब न्यायालय ने राज्य पक्ष को निर्देश दिया कि वह इस संबंध में निर्देश प्राप्त कर स्पष्ट करे कि आवश्यक sanction लिया गया था या नहीं।
इसके बाद 22.10.2024 को राज्य की ओर से instructions कोर्ट में रखी गईं, लेकिन मामला वहीं समाप्त नहीं हुआ। 12.11.2024 को न्यायालय ने उन instructions को परखने पर पाया कि उनमें यह तो कहा गया है कि “competent authority” से पूर्व स्वीकृति ली गई थी, लेकिन न तो उस competent authority का नाम बताया गया था और न sanction order की तारीख रिकॉर्ड पर लाई गई थी। अदालत ने इस पर असंतोष व्यक्त किया और कहा कि instructions बहुत casual ढंग से दी गई हैं। इतना ही नहीं, न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित sanction order रिकॉर्ड पर लाया जाए, अन्यथा विभाग का वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
21.11.2024 को जब मामला फिर सुनवाई पर आया, तब नई instructions में यह कहा गया कि 10.07.2024 को तकनीकी शिक्षा विभाग के संबंधित मंत्री द्वारा approval दिया गया था और उसके बाद CSR 351 तथा 351-A के तहत कार्यवाही शुरू की गई। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह रही कि न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बावजूद वास्तविक sanction order फिर भी रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने इस पर भी नाराजगी व्यक्त की और टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि Special Secretary ने अदालत के पूर्व आदेश, विशेषकर paragraph 6, को ठीक से देखा तक नहीं। यहीं से मामले का मूल कानूनी विवाद और स्पष्ट होकर सामने आया कि क्या मंत्री की स्वीकृति, राज्यपाल की स्वीकृति का स्थान ले सकती है।
याची की ओर से अधिवक्ता देवांश मिश्र ने Gaya Prasad Yadav v. State of U.P. के निर्णय के paragraph 21 पर भरोसा किया। उस निर्णय में कहा गया था कि CSR 351-A की भाषा, विशेषकर “The Governor reserves to himself the right” वाले शब्द, यह स्पष्ट करते हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन को रोकने, कम करने या उससे recovery करने की शक्ति राज्यपाल के पास सुरक्षित है। अर्थात, किसी सेवानिवृत्त सरकारी सेवक के विरुद्ध ऐसी कार्रवाई राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र का विषय है, किसी अन्य प्राधिकारी का नहीं। इस दलील ने मामले को केवल procedural lapse से आगे बढ़ाकर jurisdictional issue बना दिया।
26.11.2024 को अंतिम रूप से जब relevant records अदालत के सामने रखे गए, तब न्यायालय ने prima facie यह पाया कि इस मामले में राज्यपाल की अनुमति के स्थान पर संबंधित मंत्री की अनुमति दी गई थी। राज्य की ओर से Uttar Pradesh Rules of Business, 1975 का सहारा लेते हुए यह तर्क दिया गया कि संबंधित मंत्री को ऐसा आदेश देने का अधिकार है। इसके विपरीत, याची ने फिर वही दलील दोहराई कि CSR 351-A के तहत सेवानिवृत्ति के बाद की कार्रवाई के लिए राज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक है। राज्य ने यह भी कहा कि Gaya Prasad Yadav के खिलाफ SLP सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है, लेकिन यह भी स्वीकार किया गया कि उस SLP में कोई interim stay नहीं मिला है। इस स्थिति में हाईकोर्ट ने कहा कि मामला विचारणीय है।
इसी आधार पर न्यायालय ने 15.07.2024 के impugned order के effect and operation पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। साथ ही, एक mandamus जारी करते हुए कहा कि याची की पेंशन नवंबर 2024 से माह-दर-माह जारी की जाए। यह relief अत्यंत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि अदालत ने केवल तकनीकी आपत्ति नहीं देखी, बल्कि यह माना कि यदि कार्यवाही शुरू करने की वैधता ही संदेह के घेरे में है, तो पेंशन रोकना न्यायसंगत नहीं होगा।
इस अंतरिम आदेश को राज्य सरकार ने State of Uttar Pradesh and 6 Others v. Sadanand Sharma, Special Appeal Defective No. 60 of 2025 में चुनौती दी। विशेष अपील में राज्य की ओर से बिपिन बिहारी पांडेय, C.S.C. उपस्थित हुए, जबकि प्रतिवादी की ओर से फिर देवांश मिश्र ने पक्ष रखा। खंडपीठ ने 30.04.2025 को अपील खारिज करते हुए कहा कि एकलपीठ ने यह नोट किया था कि Regulation 351-A के तहत कार्यवाही शुरू करने की अनुमति राज्यपाल द्वारा नहीं, बल्कि विभागीय मंत्री द्वारा दी गई थी, और यह मुद्दा अभी रिट में विचाराधीन है। इसलिए राज्य का उचित उपाय यह है कि वह counter affidavit और stay vacation application के माध्यम से एकलपीठ के समक्ष अपनी बात रखे; इस स्तर पर अपीलीय हस्तक्षेप उचित नहीं है।
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अदालत ने अभी अंतिम रूप से यह घोषित नहीं किया कि मंत्री की स्वीकृति अवैध ही है; लेकिन उसने यह अवश्य माना कि यह प्रश्न गंभीर है और merits पर विचार योग्य है। दूसरे शब्दों में, यह एक final pronouncement नहीं बल्कि एक मजबूत interim judicial signal है कि सेवानिवृत्ति के बाद CSR 351-A के तहत कार्रवाई करते समय सक्षम स्वीकृति का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि राज्यपाल की जगह मंत्री से approval लिया गया है, तो अदालत इस पर गहन जांच कर सकती है।
इस निर्णय से निकलने वाले प्रमुख बिंदु
पहला, सेवानिवृत्ति के बाद की विभागीय कार्यवाही सामान्य departmental proceedings जैसी नहीं मानी जाएगी। उसके लिए विशेष वैधानिक शर्तों का पालन आवश्यक है। दूसरा, यदि राज्य “competent authority” का हवाला देता है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि वह authority कौन है, sanction order कब का है, और उसका दस्तावेजी आधार क्या है। तीसरा, पेंशन को अदालतें केवल monetary benefit नहीं मानतीं, बल्कि सेवानिवृत्त कर्मचारी के जीवन-निर्वाह से जुड़े अधिकार के रूप में देखती हैं। और चौथा, जब सक्षम स्वीकृति पर ही कानूनी संदेह हो, तब अदालत interim stage पर भी पेंशन संरक्षण के पक्ष में relief दे सकती है।
निष्कर्ष
Sadanand Sharma का यह प्रकरण उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ सेवानिवृत्ति के बाद CSR 351-A के तहत विभागीय कार्यवाही शुरू की जाती है। यह आदेश साफ संकेत देता है कि “मंत्री की मंजूरी” और “राज्यपाल की स्वीकृति” को अदालत एक समान मानने के लिए तैयार नहीं है, कम से कम तब तक नहीं जब तक उसका विधिक आधार स्पष्ट न कर दिया जाए। यही कारण है कि हाईकोर्ट ने न केवल impugned order पर रोक लगाई, बल्कि पेंशन जारी रखने का निर्देश भी दिया, और बाद में खंडपीठ ने भी इस अंतरिम संरक्षण में हस्तक्षेप से इंकार कर दिया।