लोक सेवा अधिकरण, लखनऊ ने माना कि केवल घटना हो जाने भर से अधिकारी की लापरवाही स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती। यदि आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य, स्पष्ट कारण और विधिसम्मत जांच न हो, तो दंडादेश टिक नहीं सकता।
Case Details
निर्देश याचिका संख्या: 288/2025 संजय कुमार त्रिपाठी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार
न्यायालय: उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण, इन्दिरा भवन, लखनऊ
पीठ: मा० न्यायमूर्ति श्रीमती साधना रानी (ठाकुर), अध्यक्ष
निर्णय दिनांक: 01.04.2026
उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण, लखनऊ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सहायक आबकारी आयुक्त संजय कुमार त्रिपाठी को बड़ी राहत दी है। अधिकरण ने 09.05.2024 के दंडादेश तथा 05.11.2024 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत उनकी निलंबन अवधि के शेष वेतन-भत्ते रोक लिए गए थे। अधिकरण ने माना कि विभागीय कार्रवाई विधिसम्मत आधार पर टिकाऊ नहीं थी और आरोपों को जिस प्रकार सिद्ध किया गया, वह कानून तथा प्राकृतिक न्याय के मानकों पर खरा नहीं उतरता।
यह मामला वर्ष 2021 की उस दुखद घटना से जुड़ा था, जिसमें बुलंदशहर के ग्राम जीतगढ़ी में कथित अवैध या जहरीली शराब के सेवन से 6 लोगों की मृत्यु हुई थी। उस समय संजय कुमार त्रिपाठी बुलंदशहर में सहायक आबकारी आयुक्त/जिला आबकारी अधिकारी के पद पर तैनात थे। शासन ने यह आरोप लगाया कि उन्होंने अपने पर्यवेक्षणीय दायित्वों का समुचित निर्वहन नहीं किया, अधीनस्थों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रखा और इसी कारण यह गंभीर घटना घटित हुई। इसी आधार पर उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू हुई।
रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि प्रारंभिक संयुक्त जांच में राजस्व, पुलिस या आबकारी विभाग के किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता नहीं पाई गई थी। बाद में मंडलायुक्त, अलीगढ़ मंडल की जांच में भी याची को दोषी नहीं पाया गया। इसके बावजूद 03.02.2023 के शासनादेश से पहले की जांच आख्या को “प्रक्रियात्मक त्रुटि” के आधार पर निरस्त करते हुए De Novo यानी fresh inquiry के आदेश दे दिए गए। इसी नई जांच के आधार पर अंततः 09.05.2024 को याची को परिनिंदा प्रविष्टि और दो वेतनवृद्धियां अस्थायी रूप से रोकने का दंड दिया गया।
याची की ओर से यह तर्क रखा गया कि ग्राम जीतगढ़ी में जिस शराब के सेवन से मृत्यु हुई, वह बुलंदशहर में बनी हुई नहीं पाई गई थी, बल्कि बाद में गौतमबुद्ध नगर में अवैध फैक्ट्री पकड़ी गई। यह भी कहा गया कि संबंधित देशी शराब दुकान की जांच में कोई अवैध मदिरा नहीं मिली, स्टॉक में कोई अनियमितता नहीं पाई गई और जांच हेतु भेजे गए नमूने भी मानक के अनुरूप पाए गए। याची ने यह भी बताया कि उनके कार्यकाल में प्रवर्तन, निरीक्षण और राजस्व संग्रहण के आंकड़े बेहतर रहे थे, इसलिए केवल इस आधार पर कि उनके कार्यकाल में घटना हुई, उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अधिकरण ने इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न De Novo जांच के औचित्य पर उठाया। निर्णय में कहा गया कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के नियम 9(1) के तहत पुनः जांच का आदेश कारणों सहित होना चाहिए। लेकिन यहां शासन ने केवल इतना कहा कि पूर्व जांच में “प्रक्रियात्मक त्रुटि” थी, जबकि यह नहीं बताया गया कि वह त्रुटि वास्तव में क्या थी। अधिकरण ने माना कि जब कारण स्पष्ट रूप से दर्ज ही नहीं किए गए, तो fresh inquiry का आधार कमजोर हो जाता है।
अधिकरण ने जांच की प्रकृति और साक्ष्यों की गुणवत्ता पर भी गंभीर टिप्पणी की। निर्णय में कहा गया कि जांच अधिकारी ने यह तो माना कि याची के कार्यकाल में अवैध शराब की बिक्री रोकने के लिए कार्रवाई हुई, जनता को जागरूक किया गया, राजस्व में वृद्धि हुई और कई प्रवर्तन कदम उठाए गए, लेकिन इसके बावजूद केवल इस आधार पर दोषी ठहरा दिया कि घटना उनके कार्यकाल में हो गई और अधीनस्थों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं था। अधिकरण ने कहा कि यह निष्कर्ष ठोस साक्ष्यों पर आधारित नहीं था। याची की विशिष्ट लापरवाही, सीधी भूमिका, दुर्भावना या ऐसा कोई प्रत्यक्ष आचरण सिद्ध नहीं किया गया, जिससे misconduct का निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से निकले।
निर्णय में यह भी रेखांकित किया गया कि विभागीय जांच में मौखिक साक्ष्य, प्रतिपरीक्षा और प्रक्रिया की निष्पक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण है। अधिकरण ने पाया कि जांच आख्या में इस बात का स्पष्ट और विधिसम्मत आधार नहीं था कि यदि याची ने कुछ व्यक्तियों से प्रतिपरीक्षा नहीं भी चाही, तो क्या विभाग ने अपने दस्तावेजी साक्ष्यों को प्रमाणित कराने के लिए विधिवत मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत किए या नहीं। इस कमी को भी अधिकरण ने गंभीर माना।
इस फैसले का सबसे उल्लेखनीय भाग वह है, जहां अधिकरण ने misconduct की अवधारणा पर न्यायिक सिद्धांतों का उल्लेख किया। अधिकरण ने कहा कि केवल कार्यकुशलता में कमी, उच्च प्रशासनिक मानक प्राप्त न कर पाना, दूरदर्शिता का अभाव, निर्णय में त्रुटि या सामान्य उदासीनता अपने-आप में misconduct नहीं बन जाती, जब तक यह न दिखाया जाए कि अधिकारी ने किसी टेढ़े उद्देश्य, बुरी नीयत या गंभीर लापरवाही के साथ कार्य किया। दूसरे शब्दों में, हर प्रशासनिक कमी अनुशासनिक दंड का आधार नहीं बन सकती।
निलंबन अवधि के वेतन-भत्तों के मुद्दे पर भी अधिकरण ने याची के पक्ष में फैसला दिया। अधिकरण ने कहा कि जब अंततः याची को केवल लघु दंड दिया गया, तब निलंबन अवधि के दौरान शेष वेतन-भत्तों को रोकना न्यायसंगत नहीं था। निर्णय में Fundamental Rule 54-B(3) और संबंधित न्यायिक दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि यदि आरोप इतने गंभीर सिद्ध नहीं हुए कि उनसे सामान्यतः बड़ी सजा उचित ठहरती, तो निलंबन को पूर्ण रूप से उचित मानकर शेष वेतन-भत्तों से वंचित नहीं किया जा सकता।
अंततः अधिकरण ने 09.05.2024 के दंडादेश को पूर्ण रूप से निरस्त कर दिया। साथ ही 05.11.2024 के उस भाग को भी रद्द कर दिया, जिसके द्वारा 14.09.2021 से 31.10.2023 तक की निलंबन अवधि में जीवन निर्वाह भत्ते से अधिक शेष वेतन-भत्तों को राजसात करने का आदेश दिया गया था। अधिकरण ने यह स्पष्ट किया कि याची नियमानुसार अवशेष वेतन-भत्ते और रोके गए सेवा लाभ पाने के अधिकारी हैं, और आदेश के अनुपालन के लिए विभाग को प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से तीन माह का समय दिया गया।
यह निर्णय विभागीय कार्यवाही के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। किसी दुखद या सनसनीखेज घटना के बाद प्रशासनिक जवाबदेही तय करना आवश्यक है, लेकिन वह जवाबदेही केवल अनुमान, दबाव या घटना की गंभीरता के आधार पर नहीं थोपी जा सकती। यदि किसी अधिकारी को दोषी ठहराना है, तो यह दिखाना होगा कि उसकी ठोस लापरवाही क्या थी, उसके समर्थन में कौन-सा विश्वसनीय साक्ष्य है, और जांच पूरी तरह नियमों तथा प्राकृतिक न्याय के अनुरूप हुई है। अन्यथा दंडादेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएगा।