केस का नाम: Sonu Sirohi v. Pushpendra Singh Sirohi and Another
कोर्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट
अपील नंबर: First Appeal No. 317 of 2019, साथ में First Appeal No. 320 of 2019
फैसला: 4 फ़रवरी 2026, जस्टिस प्रकाश पडिया।

मामले की पृष्ठभूमि
इस विवाद में दो सिविल सूट थे।
पहला, Original Suit No. 1199 of 2009, जो पति पुष्पेन्द्र सिंह सिरोही और खरीदार पूनम अग्रवाल ने पत्नी सोनू सिरोही के खिलाफ दायर किया था। इसमें फ्लैट खाली कराने, कब्जा वापस दिलाने और mesne profits/damages की मांग की गई थी।
दूसरा, Original Suit No. 1187 of 2011, जो सोनू सिरोही ने पूनम अग्रवाल, पुष्पेन्द्र सिंह सिरोही, ATS Infrastructure और Noida Authority के खिलाफ दायर किया। इसमें बेदखली रोकने और बाद में 25.03.2011 की transfer/sale deed को शून्य घोषित करने की मांग जोड़ी गई।

पति और खरीदार का पक्ष क्या था
कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार 15.06.2006 की tripartite agreement NOIDA, ATS Infrastructure Pvt. Ltd. और पति के बीच हुई थी। पति का कहना था कि पत्नी को केवल सीमित उद्देश्य से फ्लैट में आने-जाने और किराया वसूलने की अनुमति थी; यह license 17.11.2009 की notice से समाप्त कर दिया गया। बाद में NOIDA की प्रक्रिया पूरी करके फ्लैट 25.03.2011 को पूनम अग्रवाल को ₹95 लाख में ट्रांसफर/बेचा गया।

पत्नी का मुख्य दावा क्या था
पत्नी ने कहा कि फ्लैट की खरीद में उसका stridhan / joint funds लगा था, इसलिए पति अकेले फ्लैट नहीं बेच सकता था। उसने यह भी कहा कि Domestic Violence Act के तहत उसकी residential rights थीं, बच्चे भी वहीं रह रहे थे, और NOIDA/बिल्डर/पति ने मिलकर उसके अधिकारों को दरकिनार किया। यही उसका आधार था sale deed को challenge करने का।

कोर्ट ने ownership पर क्या माना
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की finding बरकरार रखी कि फ्लैट के title documents पति के नाम थे। जजमेंट में दर्ज है कि registered lease deed 16.06.2006 को केवल पति के पक्ष में थी, और HSBC Bank से loan तथा bank NOC जैसे दस्तावेज़ भी उसी के नाम के थे। कोर्ट ने कहा कि पत्नी कोई ठोस documentary evidence नहीं दिखा सकी कि उसने खरीद में पैसा लगाया था।

पत्नी की evidence क्यों कमजोर मानी गई
कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि पत्नी ने affidavit तो दिया, लेकिन बार-बार अवसर मिलने के बावजूद cross-examination के लिए पेश नहीं हुई। इसलिए उसका affidavit भरोसेमंद साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया गया। इसी आधार पर stridhan से योगदान का उसका दावा कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया।

mandatory injunction maintainable क्यों मानी गई
पत्नी की ओर से आपत्ति थी कि suit for possession होना चाहिए था, mandatory injunction नहीं। हाईकोर्ट ने यह आपत्ति नहीं मानी। कोर्ट ने कहा कि जब licensor-licensee संबंध हो और license terminate हो चुका हो, तब mandatory injunction के जरिए possession माँगा जा सकता है।

Domestic Violence Act वाली दलील पर कोर्ट का क्या रुख था
कोर्ट ने कहा कि Domestic Violence proceedings लंबित होने भर से sale deed अपने-आप अवैध नहीं हो जाती। NOIDA के पक्ष में जो indemnity bond दिया गया था, उसे भी कोर्ट ने केवल अलग व्यवस्था माना, sale deed की validity को प्रभावित करने वाली शर्त नहीं। कोर्ट ने यह भी माना कि खरीदार ने due diligence की थी और वह bona fide purchaser थी। जजमेंट में यह भी कहा गया कि रिकॉर्ड से एक से अधिक household का तत्व सामने आया, इसलिए DV Act का “shared household” तर्क इस फ्लैट को sale से बचाने के लिए पर्याप्त नहीं था।

₹60,000 प्रति माह damages क्यों लगाए गए
पत्नी ने कहा था कि उसे केवल ₹75,000 maintenance मिलता है, इसलिए ₹60,000 मासिक damages कठोर हैं। लेकिन कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष सही माना कि इस फ्लैट से पहले लगभग ₹60,000 प्रति माह किराया मिलता था। रिकॉर्ड में tenant Rohit Sharma का भी उल्लेख है। इसलिए मई 2011 से कब्जा सौंपने तक ₹60,000 प्रति माह को उचित compensation/mesne profits माना गया।

अंतिम परिणाम
हाईकोर्ट ने दोनों first appeals खारिज कर दीं और 11.12.2018 का ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा। इसका मतलब यह हुआ कि पत्नी फ्लैट पर ownership या stay का दावा साबित नहीं कर सकी, sale deed वैध मानी गई, और खरीदार के पक्ष में कब्जा तथा damages दोनों कायम रहे।

Case Details
 Case FIRST APPEAL No. 317 of 2019 at Allahabad
 Petitioner Sonu Sirohi
 Respondent Pushpendra Singh Sirohi And Another
 Petitioner Counsels Kartikeya Saran,Rahul Sahai
 Respondent Counsels Anand Kumar Tripathi,Archit Mehrotra,Atul Kumar Tiwari,Mrityunjay Pandey,Nipun Singh,Prashant Mishra,Rakesh Kumar Mathur,Sanjay Pandey,Siddharth Nandan
 District Gautam Buddh Nagar