- बिना ठोस कारण एफआईआर में देरी संदेह को देती है जन्म: कोर्ट
- उम्रकैद पाए तीन हत्यारोपियों की सजा रद्द, रिहाई का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि पक्षों के बीच पुरानी रंजिश हो और एफआईआर दर्ज करने में बिना ठोस कारण देरी की जाए, तो इससे अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनन आरोपी संदेह का लाभ पाने का हकदार होता है। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने हत्यारोपी इरफान, फहीम और सलीम को मिली उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया।
मामला रामपुर के भोट थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के अनुसार सात मार्च 2013 को मोहम्मद रफी की ट्रैक्टर से कुचलकर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि पुरानी रंजिश के चलते फहीम ने इरफान और सलीम के उकसाने पर जानबूझकर रफी पर ट्रैक्टर चढ़ाया। इस मामले में रामपुर की सत्र अदालत ने वर्ष 2017 में तीनों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ सभी आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब प्राथमिकी दर्ज करने में अकारण देरी होती है, तो इससे अभियोजन की कहानी में विचार-विमर्श और बनावटी तथ्यों को शामिल करने की आशंका बढ़ जाती है। अदालत ने यह भी कहा कि विशेषकर ऐसे मामलों में, जहां पक्षों के बीच पहले से रंजिश हो, झूठा फंसाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
लंबी सुनवाई के बाद लिखे गए 46 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने मुख्य रूप से तीन बिंदुओं को आरोपों पर संदेह का आधार माना। इन्हीं आधारों पर अदालत ने सभी आरोपियों की सजा रद्द करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दे दिया।
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