उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण, इन्दिरा भवन, लखनऊ ने अंजेश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य शीर्षक वाले मामले में दायर निर्देश याचिका संख्या 1250/2025 को खारिज कर दिया। अधिकरण ने यह फैसला 19 मार्च 2026 को सुनाया। आदेश में याची द्वारा चुनौती दिए गए 6 दिसंबर 2024 के दंडादेश और 1 अप्रैल 2025 के अपीलीय आदेश को बरकरार रखा गया।

मामला एक पुलिस अधिकारी से जुड़ा था, जिसकी नियुक्ति वर्ष 2012 में उपनिरीक्षक के पद पर हुई थी और बाद में वर्ष 2023 में उसे निरीक्षक पद पर पदोन्नति मिली। रिकॉर्ड के अनुसार, बाराबंकी जिले में तैनाती के दौरान एक पुराने आपराधिक मुकदमे की विवेचना से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज उसके स्तर से गायब पाए गए। विभाग का आरोप था कि अधिकारी यह साबित नहीं कर सका कि वे कागजात संबंधित कार्यालय या अधिकारी को विधिवत भेजे गए थे।

विभागीय रिकॉर्ड के मुताबिक, इस प्रकरण में प्रारंभिक जांच कराई गई और जांच रिपोर्ट के आधार पर अधिकारी के खिलाफ 21 अगस्त 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। आरोप यह था कि उसने अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाही बरती, आवश्यक अभिलेखों को सुरक्षित व नियमित प्रक्रिया के अनुसार अग्रसारित नहीं किया और इस कारण विभागीय कामकाज प्रभावित हुआ। बाद में दंडाधिकारी ने 6 दिसंबर 2024 को उसके खिलाफ परिनिंदा प्रविष्टि का लघु दंड पारित किया।

याची की ओर से अधिकरण में यह कहा गया कि दंडादेश और अपीलीय आदेश गलत हैं और उन्हें निरस्त किया जाना चाहिए। उसने यह भी कहा कि वह व्यक्तिगत कारणों से कारण बताओ नोटिस का उत्तर समय पर प्रस्तुत नहीं कर सका। हालांकि, अधिकरण ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि विभाग ने उसे सिर्फ नोटिस ही नहीं दिया, बल्कि बाद में अतिरिक्त अवसर भी उपलब्ध कराया था। आदेश में दर्ज है कि 27 सितंबर 2024 के पत्र के माध्यम से याची को तीन दिन के भीतर स्पष्टीकरण देने का एक और मौका दिया गया, जो उसे 2 अक्टूबर 2024 को प्राप्त भी हुआ, फिर भी उसने जवाब दाखिल नहीं किया।

अधिकरण ने अपने निर्णय में साफ कहा कि लघु दंड देने की प्रक्रिया Uttar Pradesh Police Officers of the Subordinate Ranks (Punishment and Appeal) Rules, 1991 के अनुरूप अपनाई गई। आदेश के अनुसार, ऐसे मामलों में संबंधित पुलिस अधिकारी को लिखित रूप से प्रस्तावित कार्रवाई और आरोपों की जानकारी देकर उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना जरूरी होता है, और इस मामले में यही प्रक्रिया अपनाई गई।

निर्णय में यह भी कहा गया कि याची को बचाव का समुचित अवसर दिया गया था, लेकिन उसने उसका उपयोग नहीं किया। अधिकरण ने माना कि जांच रिपोर्ट, कारण बताओ नोटिस, अतिरिक्त अवसर और उसके बाद पारित दंडादेश में कोई ऐसी कानूनी या प्रक्रियागत त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए। इसी आधार पर 6 दिसंबर 2024 के दंडादेश में हस्तक्षेप से इनकार किया गया।

अधिकरण ने आगे यह भी माना कि अपीलीय प्राधिकारी ने याची की अपील में उठाए गए बिंदुओं पर विचार करने के बाद 1 अप्रैल 2025 को अपील खारिज की थी, और उस आदेश में भी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। अंततः अधिकरण ने कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है। साथ ही, पक्षकारों को अपना-अपना व्यय स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।