सूचना का अधिकार कानून का मकसद पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है, लेकिन क्या हर देरी पर लोक सूचना अधिकारी पर धारा 20(1) के तहत तय दर से जुर्माना लगाना जरूरी है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण स्पष्टता देते हुए कहा कि धारा 20(1) के तहत दंड automatic या हर मामले में mandatory नहीं है। आयोग को पहले यह संतोषजनक निष्कर्ष दर्ज करना होगा कि मामला उस प्रावधान की शर्तों में आता है; केवल देरी हो जाना भर पर्याप्त नहीं है। यह फैसला Nitin Singhvi v. Chhattisgarh State Information Commission में 12 जून 2023 को दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि अपीलकर्ता ने 26 अप्रैल 2017 को RTI आवेदन दायर किया था। मांगी गई सूचना 30 दिनों की वैधानिक अवधि में नहीं मिली और अंततः 31 जुलाई 2017 को, यानी 66 दिन की देरी से उपलब्ध कराई गई। इसके बाद अपीलकर्ता ने शिकायत कर यह दलील दी कि धारा 20(1) के अनुसार लोक सूचना अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से ₹16,500 का जुर्माना लगाया जाना चाहिए। हालांकि राज्य सूचना आयोग ने पूरी राशि लगाने के बजाय केवल ₹2,000 का दंड लगाया।

हाईकोर्ट के सामने मुख्य विवाद यही था कि क्या धारा 20(1) की भाषा ऐसी है कि सूचना देने में देरी साबित होते ही आयोग के पास कोई विवेक नहीं बचता। अदालत ने धारा 20(1) की संरचना पर जोर देते हुए कहा कि आयोग को दंड लगाने से पहले यह राय बनानी होती है कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना उचित कारण आवेदन लेने से इंकार किया, समयसीमा में सूचना नहीं दी, या फिर मलाफाइड तरीके से सूचना रोकी, गलत/अपूर्ण/भ्रामक सूचना दी, रिकॉर्ड नष्ट किया या सूचना देने में बाधा डाली।

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में राज्य सूचना आयोग ने यह जरूर कहा था कि सूचना गलत कार्यालय को भेजने के कारण देरी हुई, लेकिन उसने यह विशिष्ट निष्कर्ष दर्ज नहीं किया कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना उचित कारण, या दुर्भावना से, या धारा 20(1) में वर्णित गंभीर प्रकार की चूक की। अदालत ने खास तौर पर नोट किया कि सूचना प्रथम अपीलीय आदेश के बाद उपलब्ध करा दी गई थी। इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल 66 दिन की देरी के आधार पर आयोग को ₹16,500 का पूर्ण दंड लगाना “अनिवार्य” नहीं माना जा सकता।

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि RTI में देरी और RTI में दंड—दोनों एक ही चीज नहीं हैं। देरी अवश्य एक गंभीर मामला है, पर दंड तभी लगेगा जब आयोग रिकॉर्ड पर यह दिखाए कि देरी ऐसी थी जो धारा 20(1) की शर्तों को पूरा करती है। यानी, हर delay = penalty का सीधा फॉर्मूला अदालत ने स्वीकार नहीं किया। यही वजह है कि हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अदालत ने RTI के महत्व को कम नहीं किया। फैसले में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए सूचना के अधिकार को एक महत्वपूर्ण साधन बताया गया है। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि जब कानून किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत आर्थिक दंड की बात करता है, तब आयोग को कानूनी मानकों का सख्ती से पालन करना होगा।

व्यावहारिक रूप से यह निर्णय दो पक्षों के लिए अहम है। RTI आवेदकों के लिए इसका अर्थ यह है कि वे देरी का मामला उठाते समय केवल delay नहीं, बल्कि यह भी दिखाएँ कि देरी बिना उचित कारण, दुर्भावनापूर्ण, या कानून के तहत दंडनीय प्रकृति की थी। वहीं लोक सूचना अधिकारियों के लिए यह निर्णय राहत देता है कि हर procedural lapse अपने-आप अधिकतम या गणनात्मक दंड में नहीं बदलेगा—हालांकि यह राहत तभी तक है जब तक उनके पास अपने आचरण का उचित स्पष्टीकरण हो।

कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला कहता है कि RTI Act की धारा 20(1) जवाबदेही सुनिश्चित करती है, पर दंड को automatic नहीं बनाती। आयोग को penalty लगाने से पहले आवश्यक निष्कर्ष दर्ज करने होंगे। इसलिए यह निर्णय RTI कानून में एक संतुलित सिद्धांत स्थापित करता है—सूचना देने की जिम्मेदारी कठोर है, लेकिन दंड लगाने की प्रक्रिया भी कानून के शब्दों और शर्तों के अनुसार ही चलेगी

Case: Nitin Singhvi v. Chhattisgarh State Information Commission
Court: High Court of Chhattisgarh, Bilaspur
Case No.: Writ Appeal No. 215 of 2020
Decision Date: 12 June 2023