छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए इस महत्वपूर्ण निर्णय में न केवल सिद्धांत स्पष्ट किया गया, बल्कि केस के तथ्यों के आधार पर यह भी बताया गया कि किस प्रकार “uncommunicated adverse entries” को compulsory retirement के लिए आधार बनाया जा सकता है। यह मामला Rajendra Kumar Vaid v. State of Chhattisgarh (WA No. 802/2025, निर्णय दिनांक 07.11.2025) से संबंधित है, जिसे बाद में Division Bench (मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु) ने पुष्टि की।

इस केस के तथ्य यह थे कि कर्मचारी राजेंद्र कुमार वैद को 1995 में Process Writer के रूप में नियुक्त किया गया था और बाद में वे Assistant Grade-II के पद पर कार्यरत थे। समय-समय पर उनकी ACRs (जैसे 2011, 2014 और 2016) में उनके कार्य एवं आचरण के संबंध में प्रतिकूल टिप्पणियाँ दर्ज की गई थीं। इसके अलावा, उनके प्रदर्शन को लेकर एक विशेष रिपोर्ट भी तैयार की गई थी, जिसके आधार पर Screening Committee ने उनकी सेवाओं को “public interest” में समाप्त करने की सिफारिश की। इसके बाद जिला न्यायाधीश ने compulsory retirement का आदेश पारित कर दिया।

कर्मचारी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए यह मुख्य तर्क दिया कि जिन adverse entries के आधार पर उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई, वे उसे कभी communicate ही नहीं की गई थीं, इसलिए उनका उपयोग करना natural justice के सिद्धांतों के विरुद्ध है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया और कहा कि compulsory retirement एक दंडात्मक (punitive) कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक निर्णय है जो संस्था के हित में लिया जाता है। इसलिए, इसमें पूरे service record का समग्र मूल्यांकन किया जाता है और इसमें uncommunicated adverse entries को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मामलों में न्यायिक समीक्षा (judicial review) का दायरा बहुत सीमित होता है। कोर्ट केवल तभी हस्तक्षेप करेगा जब आदेश मनमाना (arbitrary), दुर्भावनापूर्ण (mala fide) या बिना किसी साक्ष्य के पारित किया गया हो। केवल इस आधार पर कि adverse entries communicate नहीं की गई थीं, compulsory retirement के आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता।

इस फैसले से यह सिद्धांत और मजबूत हुआ है कि सरकारी सेवाओं में “dead wood” हटाने के लिए नियोक्ता को व्यापक विवेकाधिकार (wide administrative discretion) प्राप्त है और वह कर्मचारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड—चाहे वह communicated हो या नहीं—के आधार पर निर्णय ले सकता है, बशर्ते निर्णय bona fide और public interest में हो।