• नियुक्ति से पहले दूसरी शादी दुराचार नहीं पर शिक्षक बनने की पात्रता खत्म
  • कोर्ट ने कहा-सेवा पहले की घटना पर कार्रवाई नहीं पर नियुक्ति अवैध मानी जा सकती है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी सेवा में आने से पहले की गई दूसरी शादी (यदि पति/पत्नी पहले से विवाहित हो) को दुराचार मानकर सजा नहीं दी जा सकती, लेकिन इससे नियुक्ति की वैधता पर गंभीर असर पड़ता है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने रीना की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

कहा कि आचरण नियमावली केवल सेवा में कार्यरत कर्मचारियों पर लागू होती है। इसलिए नियुक्ति से पहले की घटनाओं के आधार पर अनुशासनात्मक दंड नहीं दिया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला ने ऐसे पुरुष से विवाह किया है, जिसकी पहली पत्नी जीवित है तो वह उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा शिक्षक सेवा नियमावली 1981 के नियम 12 के तहत शिक्षक पद के लिए अयोग्य मानी जाएगी। इस तरह की कमी नियुक्ति की जड़ को प्रभावित करती है। नियुक्ति को शुरू से ही अवैध बना सकती है।

याची की नियुक्ति-2015 में मऊ में सहायक शिक्षक के रूप में हुई थी। बाद में शिकायत आई कि उसने 2009 में ऐसे व्यक्ति से विवाह किया था, जिसकी पहली शादी कायम है। इस आधार पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से जारी आदेश में उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं तो उसने आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट ने कहा कि यूपी सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली 1956 का नियम 29 केवल सेवाकाल के दौरान के आचरण पर लागू होता है। नियुक्ति से पहले की घटनाओं पर इसके तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती। पात्रता से जुड़े नियम नियुक्ति को प्रभावित करते हैं, न कि अनुशासनात्मक दंड का आधार बनते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि नियुक्ति धोखाधड़ी या तथ्य छिपाकर हासिल की गई हो तो अलग स्थिति हो सकती है पर ऐसे तत्वों के अभाव में सीधे दंड देना उचित नहीं है।

हाईकोर्ट ने याची की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उचित नोटिस देकर नए सिरे से कानूनी आधारों पर दो महीने के भीतर फैसला लें।