WRIT – A No. – 34343 of 2013 at Allahabad : Santosh Kumar Sharma Vs. State Of U.P. And 4 Others

Date of Judgment/Order – 26/2/2026
Court Number – 32
Judgment Type – Final AFR
Coram – Hon’ble Saurabh Shyam Shamshery,J.
Petitioner’s Counsels – Santosh Kumar Sharma
Respondent’s Counsel –  A.K.S.Parihar , C.S.C. , Rajesh Kumar Singh and Vibhanshu Vaibhav

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मुकदमे में यदि किसी कर्मचारी/शिक्षक को सिर्फ “संदेह का लाभ” (Benefit of Doubt) देकर बरी किया गया हो, तो मात्र इसी आधार पर सेवा में पुनः बहाली (Reinstatement) का दावा स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, सेवा से जुड़े मामलों में राहत सामान्यतः तब बनती है जब अभियुक्त “बाइज्जत बरी” (Honourable Acquittal) हो—अर्थात आरोपों से पूरी तरह क्लीन चिट मिले, न कि केवल संदेह के कारण बरी किया जाए।

वाराणसी के एक इंटर कॉलेज शिक्षक पर 2012 में छात्राओं से छेड़खानी के आरोप लगे थे। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन/विभाग द्वारा विभागीय कार्यवाही कर शिक्षक को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। बाद में 2019 में ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। शिक्षक ने इसी बरी होने के आधार पर बर्खास्तगी आदेश रद्द कराने और सेवा में बहाली की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द करने से इन्कार कर दिया।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच के मानक अलग होते हैं। आपराधिक मुकदमे में आरोप “संदेह से परे” साबित करना पड़ता है, जबकि विभागीय जांच में निर्णय “संभावनाओं के आधार” (Preponderance of Probabilities) पर भी लिया जा सकता है। इसलिए, यह संभव है कि कोई व्यक्ति आपराधिक केस में संदेह का लाभ पाकर बरी हो जाए, लेकिन विभागीय जांच में उसी आचरण/घटना के आधार पर दोषी माना जाए।

हाईकोर्ट ने शिक्षा संस्थानों के संदर्भ में यह भी कहा कि स्कूल/कॉलेज को “शिक्षा का मंदिर” माना जाता है और छात्राओं की सुरक्षा सर्वोपरि है। ऐसे गंभीर आरोपों में अदालत केवल इस आधार पर राहत नहीं दे सकती कि ट्रायल कोर्ट ने संदेह के आधार पर बरी कर दिया है।

निष्कर्ष:
“Benefit of Doubt” पर बरी होना सेवा बहाली की गारंटी नहीं है। विभागीय कार्यवाही स्वतंत्र है और सेवा- विधि के अनुसार अलग मानकों पर तय होती है।