CRIMINAL REVISION No. – 6409 of 2025 at Allahabad : Praveen Kumar Singh Vs. State of U.P. and Another
Date of Judgment/Order – 17/2/2026
Court Number – 85
Judgment Type – Final Non AFR
Coram – Hon’ble Madan Pal Singh,J.
Petitioner’s Counsels – Kuldeep Singh Chahar
Respondent’s Counsel – G.A.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण–पोषण (Section 125 CrPC) के एक मामले में व्हाट्सएप चैट को साक्ष्य के रूप में पेश/विचार करने की अनुमति देने का अहम निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय (Family Court) विवाद के प्रभावी निस्तारण हेतु ऐसे दस्तावेज/सामग्री को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, भले ही वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत तकनीकी रूप से औपचारिक (formal) रूप से ग्राह्य/स्वीकार्य न मानी गई हो।
यह मामला मथुरा के परिवार न्यायालय से जुड़ा था, जहाँ पत्नी को ₹10,000 प्रतिमाह अंतरिम भरण–पोषण दिए जाने का आदेश हुआ था। पति ने उस आदेश के विरोध/कार्यवाही के दौरान यह दलील दी कि पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ व्यभिचारपूर्ण संबंध में रह रही है, इसलिए उसे धारा 125 के तहत भरण–पोषण पाने का अधिकार नहीं है। पति का दावा था कि उसके पास पत्नी और कथित व्यक्ति के बीच की व्हाट्सएप चैट उपलब्ध है, जो कथित रूप से अश्लील प्रकृति की है और शारीरिक संबंधों की ओर संकेत करती है।
मथुरा फैमिली कोर्ट ने चैट स्वीकार क्यों नहीं की?
पति द्वारा प्रस्तुत व्हाट्सएप चैट को परिवार न्यायालय ने इस आधार पर स्वीकार नहीं किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी (Section 65B) के तहत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र (certificate) प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस कारण ट्रायल/फैमिली कोर्ट ने चैट को साक्ष्य के रूप में लेने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा? (मुख्य कानूनी आधार)
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मदन पाल की एकलपीठ ने की। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि Family Courts Act, 1984 की धारा 14 परिवार न्यायालय को यह अधिकार देती है कि वह ऐसी किसी भी रिपोर्ट/दस्तावेज/बयान/सामग्री को स्वीकार कर सकता है जो विवाद के प्रभावी निस्तारण में सहायक हो—चाहे वह साक्ष्य अधिनियम के “कठोर तकनीकी मानकों” पर पूरी तरह खरा उतरता हो या नहीं।
अर्थात, फैमिली कोर्ट का उद्देश्य केवल तकनीकी आपत्तियों में उलझकर सामग्री को बाहर करना नहीं है, बल्कि विवाद की वास्तविकता तक पहुँचना है—बशर्ते सामग्री प्रासंगिक हो और न्यायालय उसके विश्वसनीय/सत्यापन योग्य होने पर विचार कर सके।
ट्रायल कोर्ट के आदेश में हाईकोर्ट ने क्या कमी बताई?
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने—
- व्यभिचार (adultery/extra-marital relationship) के बिंदु पर कोई स्पष्ट मुद्दा (issue) तय नहीं किया, और
- प्रस्तुत चैट/सामग्री को देखते हुए यह नहीं परखा कि क्या यह सामग्री विवाद के निर्णय में प्रासंगिक और सहायक है या नहीं।
हाईकोर्ट के अनुसार, पति के विशिष्ट कथनों और उनके समर्थन में प्रस्तुत सामग्री को देखते हुए ट्रायल कोर्ट को चाहिए था कि वह एक विशिष्ट मुद्दा तय कर, फिर साक्ष्य के आधार पर उस पर निर्णय करे।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने दिनांक 22 अगस्त 2025 के ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए मामला पुनः विचार (fresh consideration) के लिए ट्रायल कोर्ट/परिवार न्यायालय को वापस भेज दिया। साथ ही यह निर्देश दिया कि—
- दोनों पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाए, और
-
Family Courts Act की धारा 14 के आलोक में विवाद का निस्तारण किया जाए।
इस फैसले का महत्व (Why it matters)
यह आदेश खासतौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज पारिवारिक विवादों में—
- WhatsApp/Chat, Email, सोशल मीडिया मैसेज, कॉल रिकॉर्डिंग, डिजिटल फोटो/वीडियो आदि
अक्सर प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
हाईकोर्ट का संकेत यह है कि फैमिली कोर्ट “सिर्फ तकनीकी आधार” पर डिजिटल सामग्री को तुरंत बाहर नहीं कर सकता, बल्कि उसे यह देखना होगा कि सामग्री विवाद के मूल प्रश्नों (जैसे संबंध, आचरण, निर्भरता, भरण–पोषण की पात्रता आदि) से कितनी जुड़ी है।
हालाँकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर चैट स्वतः “साबित” मान ली जाएगी—कोर्ट को प्रमाणिकता (authenticity), संदर्भ (context), छेड़छाड़ की संभावना (tampering), और विश्वसनीयता जैसे पहलुओं पर भी विचार करना होगा।