उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण, इन्दिरा भवन, लखनऊ की न्यायालय संख्या–8 ने याचिका संख्या 2065/2023 में एक महत्वपूर्ण संदेश दोहराया है—ड्यूटी से लम्बी अनुपस्थिति को “चिकित्सा कारण” बताने मात्र से स्वतः वैध नहीं माना जाएगा, खासकर जब पूर्व अनुमति/स्वीकृति, नियमसम्मत मेडिकल लीव प्रक्रिया और “फिटनेस प्रमाण-पत्र” जैसी अनिवार्य औपचारिकताएँ पूरी न हों।

1) मामला क्या था?

याची (मुख्य आरक्षी) ने दिनांक 30.09.2022 के उस दण्डादेश को चुनौती दी, जिसके द्वारा उसे “परिनिन्दा प्रविष्टि” (Censure Entry) दी गई थी, तथा उसके विरुद्ध अपील निरस्त करने का आदेश दिनांक 13.07.2023 भी चुनौती के दायरे में था।

2) विभागीय आरोप (मुख्य बिन्दु)

विभाग का मुख्य आरोप यह था कि याची ने वर्ष 2021 में 7 दिन का आकस्मिक अवकाश लेकर समाप्ति के बाद समय पर वापसी नहीं की और लगभग 93 दिन अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहा। जांच में यह भी सामने आया कि:

  • याची ने फिटनेस प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया।
  • इलाज के लिए नियमों के अनुरूप शासकीय चिकित्सालय से उपचार/प्रक्रिया नहीं अपनाई गई (याची द्वारा निजी चिकित्सक/क्लिनिक के कागज प्रस्तुत किए गए)।

3) याची का बचाव क्या था?

याची का तर्क संक्षेप में यह था कि:

  • वह बीमारी/स्वास्थ्य समस्या और मानसिक तनाव/अवसाद जैसी स्थिति में था।
  • इलाज के दस्तावेज़ उसने लगाए हैं, इसलिए 93 दिन की अवधि को चिकित्सा अवकाश मानकर दोषमुक्त किया जाना चाहिए।
  • उसने यह भी कहा कि चुनाव आदि कारणों से फिटनेस सर्टिफिकेट लेने में बाधा हुई।

4) अधिकरण की प्रमुख सोच (Why the petition failed)

अधिकरण ने रिकॉर्ड/फाइल देखकर यह माना कि अनुपस्थिति तथ्यात्मक रूप से विवादित नहीं है—याची लंबे समय तक बिना पूर्व अनुमति के ड्यूटी पर नहीं आया। इसके साथ ही अधिकरण ने खास तौर पर इन बातों पर जोर दिया:

  • लम्बी अनुपस्थिति के बाद “फिटनेस प्रमाण-पत्र” का प्रस्तुत न होना गंभीर कमी है।
  • यदि बीमारी वास्तविक भी हो, तो नियमों के अनुरूप मेडिकल प्रक्रिया (जैसे सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृति, उपयुक्त मेडिकल/फिटनेस प्रमाण, और आवश्यक औपचारिकताएँ) अपेक्षित होती हैं।
  • प्रारम्भिक जांच/अभिलेखों के आधार पर दण्डादेश पारित किया गया और अपीलीय आदेश में भी पर्याप्त विचार किया गया—हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पाई गई।

5) अंतिम आदेश

अधिकरण ने याचिका को “बलहीन” मानते हुए निरस्त कर दिया और कहा कि प्रत्येक पक्ष अपना-अपना व्यय स्वयं वहन करेगा। आदेश 19.02.2026 को हस्ताक्षरित/उद्घोषित हुआ।