SL NO. Case Details Party Details Neutral Citation Number Order Date
1 WP 34625/2019 INCOME TAX OFFICER
V/S
SMT GULSANOBER
2026:KHC:11056 21/02/2026

1) मामला किस बात पर था?

पति-पत्नी के बीच मेंटेनेंस/घरेलू हिंसा (DV Act) जैसे वैवाहिक विवाद चल रहे थे। पत्नी ने RTI Act, 2005 के तहत आयकर विभाग से अपने पति के Income Tax Returns (AY 2012–2017), टैक्स भुगतान विवरण और संबंधित बैंक विवरण जैसी जानकारियाँ मांगीं।

आयकर विभाग (CPIO) ने इसे थर्ड पार्टी/फिड्युशियरी सूचना मानते हुए RTI की धारा 8(1)(e) (fiduciary capacity) के आधार पर देने से मना कर दिया।

इसके बाद:

  • प्रथम अपील (FAA) भी खारिज हुई, और कहा गया कि धारा 8(1) के तहत यह सूचना संरक्षित है तथा “larger public interest” साबित नहीं है।

  • फिर Central Information Commission (CIC) ने 12.04.2019 के आदेश से पत्नी के पक्ष में सूचना देने का निर्देश दे दिया।

आयकर विभाग ने CIC के इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

2) हाईकोर्ट के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न

न्यायालय ने (सार रूप में) ये मुद्दे देखे कि—

  • क्या Income Tax Returns “personal information” हैं (धारा 8(1)(j))?

  • क्या पति RTI में पत्नी के लिए भी “third party” माना जाएगा?

  • क्या मेंटेनेंस हेतु सूचना मांगना “larger public interest” की श्रेणी में आता है?

  • क्या सही रास्ता RTI है, या वैवाहिक अदालत से summon/production कराना?

3) हाईकोर्ट का निष्कर्ष: CIC का आदेश क्यों गलत माना गया?

हाईकोर्ट ने माना कि CIC का आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं है और उसमें कई गंभीर त्रुटियाँ हैं, जैसे—

(i) “Larger Public Interest” टेस्ट का अनुप्रयोग नहीं
धारा 8(1)(j) में निजी सूचना के अपवाद के लिए larger public interest का स्पष्ट परीक्षण आवश्यक है, लेकिन CIC ने इसका तर्कसंगत विश्लेषण नहीं किया।

(ii) सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी मिसाल को नज़रअंदाज़ करना
हाईकोर्ट ने नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि Income Tax Returns निजी सूचना हैं और सामान्यतः धारा 8(1)(j) के तहत संरक्षित रहती हैं—जब तक larger public interest न हो। CIC को इस बाइंडिंग प्रीसिडेंट के अनुरूप कारण देने चाहिए थे।

(iii) बिना स्वतंत्र विचार के पुराने आदेश पर निर्भरता
CIC ने एक पुराने मामले/आदेश का सहारा लेकर वर्तमान केस के तथ्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं किया—इसे हाईकोर्ट ने “reasoned decision” के मानक पर कमजोर माना।

4) अंतिम परिणाम: CIC का आदेश सेट-एसाइड, लेकिन पत्नी को उपाय दिया

हाईकोर्ट ने CIC का 12.04.2019 वाला आदेश रद्द/सेट-एसाइड किया और कहा कि RTI के जरिए सीधे ITR देना उचित नहीं।

लेकिन कोर्ट ने यह भी माना कि पत्नी की मेंटेनेंस संबंधी जरूरत वास्तविक हो सकती है, इसलिए उसे “liberty” दी कि वह मेंटेनेंस/वैवाहिक अदालत में आवेदन देकर आयकर विभाग से ITR/financial records produce कराने हेतु निर्देश मांगे; ऐसी अर्जी को कोर्ट मेरिट पर देखेगी।

5) कोर्ट ने “सही रास्ता” क्या बताया? (Practical Takeaway)

हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश यह रहा कि—
मेंटेनेंस/एलिमनी के लिए पति/पत्नी की आय की जानकारी चाहिए तो RTI को “judicial discovery” का विकल्प न बनाएं।
✅ उचित उपाय: संबंधित अदालत से दस्तावेज़ तलब (summon) कराएं।

कोर्ट ने बताया कि अदालत के पास पर्याप्त शक्ति है, जैसे—

  • Order XVI Rule 6, CPC: दस्तावेज़ प्रस्तुत करने हेतु किसी को समन कर सकती है।

  • Section 165 Evidence Act (अब BSA 2023 की धारा 168): दस्तावेज उत्पादन का आदेश/प्रश्न पूछने की शक्ति।

  • यदि अदालत आयकर विभाग को ITR देने का निर्देश दे, तो विभाग को पालन करना होगा—इसे कोर्ट ने स्वीकार किया।

6) इस फैसले का महत्व (Why it matters)

  1. ITR = Personal Information: सामान्य स्थिति में इसे RTI से देना निजता पर अनुचित हस्तक्षेप माना जाएगा।

  2. Spouse होने मात्र से RTI-exemption खत्म नहीं होती: वैवाहिक संबंध अपने आप में “larger public interest” नहीं बन जाता; परीक्षण आवश्यक है।

  3. मेंटेनेंस मामलों में दस्तावेज़ लाने का प्राथमिक मंच अदालत है: ताकि आवश्यकता/प्रासंगिकता/सीमा तय करके न्यायिक निगरानी में रिकॉर्ड बुलाया जा सके।

निष्कर्ष

यह फैसला RTI और Privacy के बीच संतुलन को रेखांकित करता है। अदालत ने CIC के RTI-आधारित disclosure को रोका, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि जरूरतमंद पक्ष (यहाँ पत्नी) को कोर्ट के माध्यम से वैध/प्रभावी उपाय उपलब्ध रहे।