- 1) केस का परिचय
- 2) याची की मुख्य मांगें
- 3) याची की दलीलें (क्यों ट्रांसफर जरूरी बताया गया?)
- 4) राज्य सरकार की आपत्तियाँ (रिट क्यों “मेंटेनेबल” नहीं?)
- 5) कोर्ट की प्रमुख observations: ट्रांसफर कोर्ट का काम नहीं, प्रशासन का क्षेत्र
- 6) सुप्रीम कोर्ट की मिसालें, जिन पर कोर्ट ने भरोसा किया
- 7) “ट्रांसफर पॉलिसी” पर कोर्ट का स्पष्ट संदेश
- 8) अंतिम निर्णय
- 9) निष्कर्ष
WRIT – C No. – 10470 of 2025 at Lucknow : Ful Chandra Vs. State Of U.P. Thru. Addl. Chief Secy. Panchayat Raj Lko. And 5 Others
Date of Judgment/Order – 7/1/2026
Court Number – 3
Judgment Type – Final Non AFR
Coram – Hon’ble Shekhar B. Saraf,J. and Hon’ble Manjive Shukla,J.
Petitioner’s Counsels – Mithila Bakhsh Tiwari , Alok Shukla and Amar Singh
Respondent’s Counsel – C.S.C.
1) केस का परिचय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ में WRIT-C No. 10470 of 2025 (Ful Chandra बनाम State of U.P. व अन्य) में याची ने अदालत से यह मांग की कि राज्य सरकार मुख्य सचिव द्वारा जारी ट्रांसफर पॉलिसी दिनांक 06.05.2025 का पालन करे और प्रतिवादी संख्या 6 (Assistant Development Officer (Panchayat) / पूर्व में Village Development Officer) को ब्लॉक सफीपुर, जनपद उन्नाव से हटाकर दूसरे स्थान/जनपद में स्थानांतरित किया जाए, साथ ही उनके विरुद्ध आरोपों की जांच कराई जाए।
2) याची की मुख्य मांगें
याची ने मुख्यतः तीन राहतें मांगीं—
- ट्रांसफर पॉलिसी (06.05.2025) का अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए।
- प्रतिवादी संख्या 6 को सफीपुर, उन्नाव से दूसरे ब्लॉक/जनपद में ट्रांसफर करने का आदेश दिया जाए।
- ग्रामीणों/शिकायतों में लगाए गए आरोपों पर जांच कराने का निर्देश दिया जाए।
3) याची की दलीलें (क्यों ट्रांसफर जरूरी बताया गया?)
याची का तर्क था कि—
- प्रतिवादी संख्या 6 लंबे समय से एक ही जनपद उन्नाव में कार्यरत हैं (प्रारंभिक नियुक्ति 1997 से),
- लंबे पोस्टिंग का लाभ लेकर वे कथित रूप से विभिन्न विकास योजनाओं के सरकारी धन के गबन/अनियमितता में “इंस्ट्रूमेंटल” रहे,
- और ट्रांसफर पॉलिसी के अनुसार 7 वर्ष से अधिक एक ही जनपद में रहने पर दूसरे जनपद में ट्रांसफर होना चाहिए।
4) राज्य सरकार की आपत्तियाँ (रिट क्यों “मेंटेनेबल” नहीं?)
राज्य की ओर से मुख्य आपत्तियाँ यह रहीं—
- याची ने यह नहीं बताया कि वह व्यक्तिगत रूप से कैसे “अग्रेव्ड” (aggrieved) है;
- ट्रांसफर/पोस्टिंग प्रशासनिक क्षेत्र (exclusive administrative domain) में आता है;
- ट्रांसफर पॉलिसी/GO सामान्यतः गाइडलाइन होती है, जिसे किसी तीसरे व्यक्ति के कहने पर कोर्ट से “एन्फोर्स” नहीं कराया जा सकता;
- सुप्रीम कोर्ट की अनेक मिसालें कहती हैं कि कोर्ट ट्रांसफर मामलों में तभी दखल देगी जब मलाफाइड या स्टैच्यूटरी रूल का उल्लंघन स्पष्ट हो।
5) कोर्ट की प्रमुख observations: ट्रांसफर कोर्ट का काम नहीं, प्रशासन का क्षेत्र
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर कहा कि—
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प्रतिवादी संख्या 6 पहले VDO थे, जिनका कैडर ब्लॉक-लेवल होता है; इसलिए लंबे समय तक उसी ब्लॉक में पोस्टिंग का एक प्रशासनिक संदर्भ हो सकता है।
- बाद में 15.07.2021 को प्रमोशन के बाद वे Asoha में रहे और फिर 09.05.2022 को पुनः Safipur पोस्ट हुए।
- ट्रांसफर का निर्णय राज्य सरकार का विशेषाधिकार/प्रशासनिक निर्णय है—लोकहित और प्रशासनिक आवश्यकता देखकर सरकार तय करती है।
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शिकायतें हों तो सक्षम अधिकारी विचार कर सकते हैं; परंतु तीसरा व्यक्ति (जो व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं) अदालत से सीधे ट्रांसफर कराने की मांग नहीं कर सकता।
6) सुप्रीम कोर्ट की मिसालें, जिन पर कोर्ट ने भरोसा किया
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रांसफर मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा पहले से तय है। इस निर्णय में मुख्यतः ये नजीरें उद्धृत/आधारित रहीं—
- Union of India v. S.L. Abbas (1993) 4 SCC 357: किसे कहाँ पोस्ट करना है, यह सक्षम प्राधिकारी का विषय; कोर्ट तभी दखल देगी जब मलाफाइड या वैधानिक उल्लंघन हो; गाइडलाइंस से “कानूनी अधिकार” पैदा नहीं होता।
- Mrs. Shilpi Bose v. State of Bihar (AIR 1991 SC 532): ट्रांसफर आदेश सार्वजनिक हित/प्रशासनिक कारणों से हों तो सामान्यतः कोर्ट हस्तक्षेप न करे; केवल executive instructions के उल्लंघन मात्र से दखल नहीं।
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State Bank of India v. Anjan Sanyal (2001) 5 SCC 508: ट्रांसफर सेवा-शर्त का हिस्सा है; कोर्ट हल्के में हस्तक्षेप न करे, जब तक मलाफाइड/अयोग्यता/नियम-विरुद्धता न हो।
7) “ट्रांसफर पॉलिसी” पर कोर्ट का स्पष्ट संदेश
इस फैसले का सबसे व्यावहारिक निष्कर्ष यह है कि—
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राज्य सरकार की ट्रांसफर पॉलिसी/GO प्रायः guiding factors होती है,
- उसे कोर्ट में mandamus के जरिए, विशेषकर किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा, सामान्य रूप से एन्फोर्स नहीं कराया जा सकता,
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जब तक मामला स्टैच्यूटरी रूल के उल्लंघन या मलाफाइड से सीधे-सीधे जुड़ा न हो।
8) अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका मेरिट-रहित है और इसे खारिज किया जाता है। (निर्णय दिनांक: 07.01.2026)
9) निष्कर्ष
यह निर्णय उन मामलों के लिए मार्गदर्शक है जहाँ लोग ट्रांसफर पॉलिसी के आधार पर किसी अधिकारी का तबादला कोर्ट से कराने का प्रयास करते हैं। हाईकोर्ट ने पुनः रेखांकित किया कि ट्रांसफर प्रशासनिक निर्णय है, और ट्रांसफर पॉलिसी को अदालत से सामान्यतः लागू नहीं कराया जा सकता, जब तक कि गंभीर कानूनी आधार (मलाफाइड/स्टैच्यूटरी उल्लंघन) स्पष्ट न हो।