उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों (प्रधान/सदस्य) के वित्तीय व प्रशासनिक अधिकार कभी-कभी शिकायतों के आधार पर सीज (seize) कर दिए जाते हैं। ऐसे ही एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि बिना ठोस साक्ष्य (solid evidence) और बिना स्पष्ट कारण (clear reasons) के किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के अधिकार छीनना अनुचित है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ऐसे आदेश “तर्कहीन” (unreasoned) नहीं होने चाहिए, बल्कि कारण-सहित और साक्ष्य-आधारित होने चाहिए।
मामला क्या था?
यह मामला प्रयागराज के प्रतापपुर ब्लॉक स्थित मिर्जापुर ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान जटा शंकर तिवारी से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 20 जून 2025 की बैठक में पाँच सदस्यों के फर्जी अंगूठे के निशान लगाकर समितियों का गठन कराया गया। इसी आधार पर जिलाधिकारी ने जांच के बाद प्रधान के सभी अधिकार सीज कर दिए थे। इसके खिलाफ ग्राम प्रधान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट (न्यायमूर्ति अनीश कुमार की एकल पीठ) ने कहा कि—
- बिना ठोस साक्ष्य और बिना स्पष्ट कारण किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के अधिकार छीनना उचित नहीं है।
- DM द्वारा पारित आदेश में साक्ष्यों का समुचित विश्लेषण नहीं दिखता; इसलिए आदेश तर्कहीन माना गया।
- हस्ताक्षर/अंगूठा-निशानी जैसे विवादों का निस्तारण सामान्यतः फॉरेंसिक जांच के बाद ही संभव है; लेकिन इस मामले में अंगूठा-निशानी/हस्ताक्षर का सत्यापन ही नहीं कराया गया।
- अदालत ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता द्वारा पहले भी शिकायत दर्ज कराई गई थी, जो गलत पाई गई—इससे शिकायत की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता है।
अदालत ने DM के आदेश पर रोक लगाते हुए छह सप्ताह में जवाब भी तलब किया।