CRIMINAL APPEAL No. – 2903 of 2020 at Allahabad : Shakeel Ahmad And Another Vs. State Of U.P.
Date of Judgment/Order – 13/2/2026
Court Number – 43
Judgment Type – Final AFR
Coram – Hon’ble Salil Kumar Rai,J. and Hon’ble Vinai Kumar Dwivedi,J.
Petitioner’s Counsels – Arvind Kumar Srivastava , R.P.S. Chauhan , Rajiv Sisodia , Shailesh Kumar Srivastava and Shyam Shanker Pandey
Respondent’s Counsel – G.A.
दहेज हत्या (Dowry Death) के मामलों में आम तौर पर यह धारणा बन जाती है कि दोष सिद्ध होते ही उम्रकैद (Life Imprisonment) “डिफॉल्ट” सजा होगी। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल के एक फैसले में स्पष्ट किया है कि हर दहेज हत्या के मामले में अधिकतम सजा (उम्रकैद) देना अनिवार्य नहीं है। अदालत के अनुसार सजा न तो इतनी कम हो कि मजाक लगे, और न इतनी कठोर हो कि सुधार की गुंजाइश ही खत्म हो जाए। यानी सजा का सिद्धांत “संतुलन” और “अनुपात” (proportionality) पर टिकता है।
केस की पृष्ठभूमि
रिपोर्ट के मुताबिक मामला बिजनौर जिले के चांदपुर थाना क्षेत्र का था। विवाह दिसंबर 2014 में हुआ और अप्रैल 2015 में महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में जलने से मृत्यु हो गई। मायके पक्ष ने आरोप लगाया कि दो लाख रुपये और बाइक की मांग पूरी न होने पर उसे जलाया गया। ट्रायल कोर्ट ने 2018 में पति और ससुर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ अपील हाईकोर्ट में आई।
हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सजा के प्रश्न पर विचार किया और रिपोर्ट के अनुसार, लंबे समय से जेल में बिताई गई अवधि को देखते हुए आदेश पारित किया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति सलील कुमार राय और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी) ने कहा कि:
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दहेज हत्या के हर मामले में उम्रकैद देना जरूरी नहीं है।
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सजा तय करते समय यह देखा जाना चाहिए कि अपराध की प्रकृति, मामले की परिस्थितियाँ, और अभियुक्त की भूमिका/सीधा संबंध कितना है।
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सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्याय + निवारण + सुधार—तीनों के बीच उचित संतुलन बनाना भी है।
“न्यूनतम 7 साल” और “उम्रकैद” का कानूनी ढांचा
दहेज मृत्यु के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 304B में सजा का ढांचा बहुत स्पष्ट है:
यानी कानून खुद यह संकेत देता है कि यह “एक ही सजा” वाला अपराध नहीं है; परिस्थितियों के आधार पर 7 साल से लेकर उम्रकैद तक सजा हो सकती है। हाईकोर्ट ने इसी वैधानिक ढांचे के अनुरूप यह कहा कि सीधे अधिकतम सजा (उम्रकैद) देना हर केस में उचित नहीं हो सकता।
“सामाजिक-आर्थिक स्थिति” को नजरअंदाज करना गलत
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अदालत ने सामाजिक-आर्थिक स्थिति (socio-economic background) पर भी जोर दिया। कोर्ट ने पाया कि:
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दोनों पक्ष दिहाड़ी मजदूर वर्ग से जुड़े थे।
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ट्रायल कोर्ट ने सजा सुनाते समय दोषियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर पर्याप्त विचार नहीं किया।
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जबकि सजा निर्धारण (sentencing) में इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत का आशय यह नहीं कि गरीबी अपराध को “माफ” कर देती है—बल्कि यह कि सजा तय करने में अदालत को व्यक्तिगत परिस्थितियाँ भी देखनी होती हैं ताकि दंड न्यायसंगत और अनुपातिक रहे।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध को “हल्का” नहीं करता, बल्कि सजा निर्धारण को अधिक न्यायसंगत, विवेकपूर्ण और कानून-संगत बनाता है। संदेश यही है कि दंड प्रक्रिया में “कठोरता” और “न्याय” दोनों साथ चलें—और सजा ऐसी हो जो अपराध की गंभीरता, परिस्थितियों, भूमिका, और सुधार की संभावना—इन सबके संतुलन से तय हो।
डिस्क्लेमर: यह ब्लॉग पोस्ट सामान्य जानकारी/शैक्षिक उद्देश्य से है। किसी विशिष्ट मामले में कानूनी सलाह के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श लें।