इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि सिर्फ नैतिक दायित्व के आधार पर बहू को अपने सास-ससुर का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है और यह केवल उन्हीं व्यक्तियों को उपलब्ध है जिन्हें कानून में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
यह फैसला Rakesh Kumar and Another v. State of U.P. and Another मामले में आया, जिसमें मृतक पुत्र के माता-पिता ने अपनी बहू से मेंटेनेंस की मांग की थी। उनका कहना था कि वे वृद्ध, अशिक्षित और आर्थिक रूप से निर्भर हैं तथा अपने पुत्र की मृत्यु के बाद बहू के पास पर्याप्त आय है, इसलिए उसे उनका पालन-पोषण करना चाहिए।
अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि Section 125 Cr.P.C. तथा उसके समकक्ष प्रावधानों के तहत मेंटेनेंस केवल उन्हीं श्रेणियों के व्यक्तियों को मिल सकता है, जिन्हें कानून ने expressly मान्यता दी है। माता-पिता-in-law यानी सास-ससुर को इस प्रावधान में शामिल नहीं किया गया है, इसलिए बहू पर ऐसा कानूनी दायित्व नहीं डाला जा सकता।
कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि यदि बहू ने पति की संपत्ति या सेवा-सम्बन्धी लाभ प्राप्त किए हों, तब भी वह प्रश्न इस प्रकार की summary maintenance proceedings में तय नहीं किया जा सकता। ऐसे विवाद अलग विधिक मंच पर उठाए जा सकते हैं, लेकिन Section 125/समकक्ष प्रावधानों के तहत नहीं।
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अदालत की यह टिप्पणी है कि “moral obligation” को “legal obligation” में तब्दील नहीं किया जा सकता, जब तक उसके पीछे स्पष्ट statutory mandate न हो। यानी समाज या परिवार की दृष्टि से बहू से सहायता की अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन अदालत केवल नैतिकता के आधार पर ऐसा आदेश पारित नहीं कर सकती।
अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट, आगरा द्वारा पारित आदेश में कोई illegality, perversity या infirmity नहीं है। इसलिए revision को खारिज कर दिया गया।
मुख्य निष्कर्ष
इस फैसले से यह सिद्ध होता है कि:
भरण-पोषण का दावा केवल वही व्यक्ति कर सकता है जिसे कानून ने स्पष्ट रूप से यह अधिकार दिया हो।
सास-ससुर, बहू से Section 125 Cr.P.C. या उसके समकक्ष प्रावधानों के तहत मेंटेनेंस नहीं मांग सकते।
नैतिक जिम्मेदारी और कानूनी जिम्मेदारी दोनों अलग-अलग अवधारणाएँ हैं, और अदालत केवल कानून के आधार पर ही आदेश दे सकती है।
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