इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Writ Tax No. 5977 of 2025, Vijay Kumar Sharma v. State of U.P. and 4 Others में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। माननीय न्यायमूर्ति Piyush Agrawal ने 24.03.2026 को यह निर्णय सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब राज्य स्वयं किसी व्यक्ति को शराब बिक्री का लाइसेंस दे चुका है, तब बाद में केवल यह कहकर कठोर कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता कि शराब का व्यापार कोई मौलिक अधिकार नहीं है। कोर्ट ने Khoday Distilleries के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि एक बार राज्य किसी व्यक्ति को व्यापार करने की अनुमति दे देता है, तो उसके साथ मनमाना या भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं किया जा सकता।

मामले के तथ्य यह थे कि याची के पास आबकारी वर्ष 2020-21 में मेरठ जनपद के Village Parikshitgarh और Village Maukhas की देशी शराब दुकानों के लाइसेंस थे। लॉकडाउन के दौरान Parikshitgarh दुकान से शराब तस्करी का आरोप लगाते हुए एक एफआईआर दर्ज हुई। इसके बाद पहले Parikshitgarh की दुकान का लाइसेंस रद्द किया गया, और फिर उसी आधार पर Maukhas स्थित दूसरी दुकान का लाइसेंस भी धारा 34(2) U.P. Excise Act तथा Rule 21(3) के तहत निरस्त कर दिया गया। साथ ही याची को बिना किसी अवधि का उल्लेख किए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया और उसकी प्रतिभूति तथा लाइसेंस राशि भी जब्त कर ली गई।

कोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण observation यह रही कि दूसरी दुकान का लाइसेंस केवल इस आधार पर स्वतः रद्द नहीं किया जा सकता कि पहली दुकान का लाइसेंस रद्द हो चुका है। न्यायालय ने कहा कि धारा 34(2) के तहत दी गई शक्ति विवेकाधीन (discretionary) है, अनिवार्य नहीं। इसलिए प्राधिकारी को स्वतंत्र रूप से यह दर्ज करना होगा कि दूसरी दुकान को चलने देना राजस्व के हित के लिए हानिकारक कैसे है। यदि आदेश में केवल धारा और नियम का हवाला हो, पर कोई स्वतंत्र कारण, संतोष या तथ्यात्मक निष्कर्ष न हो, तो ऐसा आदेश टिक नहीं सकता। यही कमी इस मामले में पाई गई।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अनिश्चितकाल के लिए blacklisting विधि-सम्मत नहीं है। इस प्रकार की कार्रवाई लाइसेंसी के लिए “commercial death” जैसी स्थिति पैदा करती है। इसलिए ब्लैकलिस्टिंग आदेश में उसकी अवधि स्पष्ट होना आवश्यक है। न्यायालय ने माना कि याची को बिना अवधि बताए काली सूची में डालना कानून के स्थापित सिद्धांतों के विरुद्ध था।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह था कि जिस वाहन से कथित शराब परिवहन का आरोप था, वह एक पुलिस कांस्टेबल का बताया गया, लेकिन उसके विरुद्ध कोई समुचित कार्रवाई रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई। कोर्ट ने यह तथ्य भी नोट किया कि वाहन बाद में उसके पक्ष में रिलीज कर दिया गया। न्यायालय ने इन परिस्थितियों को भी इस बात का संकेत माना कि दूसरी दुकान के लाइसेंस रद्दीकरण के लिए स्वतंत्र और ठोस आधार नहीं था।

राज्य की ओर से यह आपत्ति उठाई गई थी कि याची के पास revision का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था, इसलिए writ petition सुनवाई योग्य नहीं है। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि जहाँ विवाद pure question of law का हो और विस्तृत तथ्य-जांच आवश्यक न हो, वहाँ Article 226 के तहत रिट याचिका maintainable हो सकती है। कोर्ट ने alternative remedy को पूर्ण बाधा मानने से इंकार किया।

अंततः हाईकोर्ट ने मऊखास दुकान के लाइसेंस निरस्तीकरण और ब्लैकलिस्टिंग के आदेशों को खारिज (Quash) कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि चूँकि संबंधित आबकारी वर्ष समाप्त हो चुका है, इसलिए याची लाइसेंस की निरंतरता का दावा नहीं कर सकता; लेकिन यदि नई नीति के अंतर्गत वह पात्र होता है, तो जब्त राशि समायोजित की जा सकती है, अन्यथा तीन माह के भीतर forfeited amount वापस किया जाए।

Case Details
 Case WRIT TAX No. 5977 of 2025 at Allahabad
 Petitioner Vijay Kumar Sharma
 Respondent State Of U.P. And 4 Others
 Petitioner Counsels Raj Kumar Singh,Rajat Aren
 Respondent Counsels C.S.C.
 District Meerut