इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो मात्र इस आधार पर उसके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने साफ कहा कि “morality and law have to be kept apart”, यानी नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखना होगा।
यह आदेश Criminal Misc. Writ Petition No. 3799 of 2026, Anamika and another v. State of U.P. and others में न्यायमूर्ति J.J. Munir और न्यायमूर्ति Tarun Saxena की खंडपीठ ने पारित किया। आदेश में दर्ज है कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और साथ रह रहे हैं। जब यह आपत्ति उठाई गई कि पुरुष पहले से विवाहित है, तब कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में, यदि संबंध सहमति से है, तो “for any offence, whatsoever” अभियोजन का आधार नहीं बनता।
कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि जब कानून के तहत कोई अपराध बनता ही नहीं, तब सामाजिक राय और नैतिक धारणाएँ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में अदालत का मार्गदर्शन नहीं कर सकतीं। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लिव-इन संबंधों को लेकर समाज में अक्सर नैतिक बहस होती है, लेकिन अदालत ने यहाँ कानूनी दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी।
मामले में याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि वे अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, लेकिन महिला के परिवार से उन्हें खतरा है। हाईकोर्ट ने पाया कि प्रथमदृष्टया मामला बनता है और दोनों को अंतरिम राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। साथ ही, शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया गया।
कोर्ट ने Shakti Vahini v. Union of India, (2018) 7 SCC 192 का हवाला देते हुए कहा कि दो बालिग व्यक्तियों की सुरक्षा करना पुलिस का कर्तव्य है, खासकर तब जब उन्हें परिवार या समाज से खतरा हो। आदेश में परिवार के सदस्यों को भी याचिकाकर्ताओं को नुकसान पहुँचाने, घर में घुसने, या किसी भी माध्यम से संपर्क कर परेशान करने से रोका गया।
मुख्य बात
इस आदेश का सीधा अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने विवाहेतर संबंध को सामाजिक स्वीकृति दे दी है। अदालत ने केवल इतना कहा है कि दो बालिगों का सहमति से साथ रहना, अपने आप में अपराध नहीं है। यानी हर नैतिक रूप से विवादित संबंध, कानूनी रूप से अपराध नहीं बन जाता।
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